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सर्वकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 64

हरिवंशपर्व ] दशमोऽध्यायः ४१

वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतर्षभ! वैवस्वत मनुके उनके ही समान इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्णु, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रांशु, सातवें नाभागारिष्ट, करुष और पृषध्र—ये नौ पुत्र हुए ॥ १-२ ॥

अकरोत् पुत्रकामस्तु मनुरिष्टिं प्रजापतिः।
मित्रावरुणयोस्तात पूर्वमेव विशांपते ॥ ३ ॥
अनुत्पन्नेषु नवसु पुत्रेष्वेतेषु भारत।
तस्यां तु वर्तमानायामिष्ट्यां भरतसत्तम ॥ ४ ॥
मित्रावरुणयोरंशे मुनिराहुतिमाजुहोत्।
आहुत्यां हूयमानायां देवगन्धर्वमानुषाः ॥ ५ ॥
तुष्टिं तु परमां जग्मुर्मुुनयश्च तपोधनाः।
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहोऽस्य श्रुतमद्भुतम् ॥ ६ ॥

प्रजापालक तात! इन नौ पुत्रोंके उत्पन्न होनेसे पहिले प्रजापति मनुने पुत्रकी कामनासे मित्रावरुणकी इष्टि (यज्ञ) की थी। भारत! जब यह इष्टि हो रही थी, उस समय मुनिने मित्रावरुणके लिये आहुति दी। भरतश्रेष्ठ! आहुतिके सम्पन्न होनेपर देवता, गन्धर्व, मनुष्य और तपोधन मुनि परम प्रसन्न हुए (और कहने लगे—) 'अहो! इसका तपोबल आश्चर्यजनक है और इसका शास्त्रीय ज्ञान भी अद्भुत है!' ॥ ३-६॥

तत्र दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता।
दिव्यसंहनना चैव इला जज्ञे इति श्रुतिः ॥ ७ ॥

उस यज्ञमें दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य शरीरवाली इला नामक कन्या उत्पन्न हुई थी, ऐसी ख्याति है ॥ ७ ॥

तामिलेत्येव होवाच मनुर्दण्डधरस्तदा।
अनुगच्छस्व मां भद्रे तमिला प्रत्युवाच ह।
धर्मयुक्तमिदं वाक्यं पुत्रकामं प्रजापतिम् ॥ ८ ॥

राजा मनुने उस कन्याको 'इला' कहकर पुकारा और कहा—'भद्रे! तू मेरे पीछे-पीछे आ।' तब पुत्रकी कामनावाले प्रजापतिको इलाने यह धर्ममय उत्तर दिया॥ ८॥

इलोवाच

मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर।
तयोः सकाशं यास्यामि न मां धर्मो हतोऽवधीत्॥ ९ ॥

इलाने कहा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ! मैं धर्मकी हत्या नहीं कर सकती, अन्यथा धर्म मुझे भी मार डालेगा। मैं मित्रावरुणके अंशसे उत्पन्न हुई हूँ; अतः उनके ही पास जाऊँगी ॥९॥

सैवमुक्त्वा मनुं देवं मित्रावरुणयोरिला।
गत्वांतिकं वरारोहा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १० ॥

श्रेष्ठ नितम्बोंवाली इला राजा मनुसे इस प्रकार कहकर मित्रावरुणके पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहने लगी—॥ १० ॥

अंशेऽस्मि युवयोर्जाता देवौ किं करवाणि वाम्।
मनुना चाहमुक्ता वै अनुगच्छस्व मामिति ॥ ११ ॥

'देवताओ! मैं आप दोनोंके अंशसे उत्पन्न हुई हूँ; अतः आपलोग बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मनुजीने मुझसे कहा है कि तू मेरे पीछे-पीछे आ' ॥११॥

तां तथावादिनीं साध्वीमिलां धर्मपरायणाम्।
मित्रश्च वरुणश्चोभावूचतुर्यन्निबोध तत् ॥ १२ ॥

राजन्! धर्मपरायणा साध्वी इलाके इस प्रकार कहनेपर मित्र और वरुणने उससे जो कुछ कहा था, उसे सुनो ॥ १२ ॥

अनेन तव धर्मेण प्रश्रयेण दमेन च।
सत्येन चैव सुश्रोणि प्रीतौ स्वो वरवर्णिनि ॥ १३ ॥

'सुन्दर कटिभागवाली सुन्दरी! तेरे इस धर्म, विनय, इन्द्रियसंयम और सत्यसे हम दोनों तुमपर बहुत प्रसन्न हैं ॥१३॥

आवयोस्त्वं महाभागे ख्यातिं कन्येति यास्यसि।
मनोर्वंशधरः पुत्रस्त्वमेव च भविष्यसि ॥ १४ ॥

'महाभागे! तू हमारी पुत्रीरूपसे प्रसिद्ध होगी और मनुका वंशधर पुत्र भी तू ही होगी॥ १४ ॥

सुद्युम्न इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु शोभने।
जगत्प्रियो धर्मशीलो मनोर्वंशविवर्धनः ॥ १५ ॥

'शोभने! (उस समय) तू मनुके वंशको बढ़ानेवाले, जगत्में प्रिय, धर्मशील सुद्युम्नके नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगी' ॥ १५ ॥

निवृत्ता सा तु तच्छ्रुत्वा गच्छन्ती पितुरन्तिकम्।
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनायोपमन्त्रिता ॥ १६ ॥

इस बातको सुनकर वह अपने पिता मनुके पास वापस जा रही थी; इसी बीचमें अवसर देखकर बुधने उसे सहवासके लिये आमन्त्रित किया ॥ १६ ॥

सोमपुत्राद् बुधाद् राजंस्तस्यां जज्ञे पुरूरवाः।
जनयित्वा सुतं सा तमिला सुद्युम्नतां गता ॥ १७ ॥

राजन्! चन्द्रमाके पुत्र बुधद्वारा उस इलाके गर्भसे पुरूरवा उत्पन्न हुए और उस पुत्रको उत्पन्न करके वह इला सुद्युम्न हो गयी ॥ १७ ॥

सुद्युम्नस्य तु दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः।
उत्कलश्च गयश्चैव विन्ताश्वश्च भारत ॥ १८ ॥

भारत! सुद्युम्नके उत्कल, गय और विन्ताश्व नामक तीन परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥

उत्कलस्योत्कला राजन् विन्ताश्वस्य पश्चिमा।
दिक् पूर्वा भरतश्रेष्ठ गयस्य तु गया पुरी ॥ १९ ॥

राजन्! उत्कलकी राजधानी उत्कला (उड़ीसा) हुई।