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सर्वकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 567, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 567

विष्णुपर्व ] चतुरशीतितमोऽध्यायः ५४५
भरतनन्दन ! कितने ही दैत्य वेगशाली मगरों, शिशुमारों शल्यश्च शकुनिश्चोभौ भगदत्तश्च पार्थिवः ।
(सँसों), भैंसों, गैंडों, ऊँटों और कछुओंपर भी सवार थे । १३। जरासंधस्त्रिगर्तश्च विराटश्च सहोत्तरः ॥ २१ ॥
एतैरेव रथैर्युक्ता विविधायुधपाणयः । युद्धार्थमुद्यता वीरा निकुम्भाद्या जयैषिणः ।
किरीटापीडमुकुटैरङ्गदैरपि मण्डिताः ॥ १४ ॥ युयुत्समाना यदुभिर्दैवैरिव महासुराः ॥ २२ ॥
कितनोंके पास इन्हीं वाहनोंसे जुते हुए रथ थे । उन शल्य, शकुनि, राजा भगदत्त, जरासंध, त्रिगर्तराज
रथोंसे सम्पन्न हुए वे दैत्य अपने हाथोंमें नानाप्रकारके आयुध सुशर्मा और उत्तरसहित राजा विराट--ये वीर नरेश
लिये हुए थे । वे किरीट, मुकुट या पगड़ी तथा अङ्गदों विजयकी अभिलाषा रखकर निकुम्भकी प्रधानतामें युद्धके
(भुजबंदों) से अलंकृत थे ॥ १४ ॥ लिये उद्यत हुए थे । जैसे महान् असुर देवताओंके साथ
नानार्दमानैर्विविधैस्तूर्यैर्नेमिस्वनाकुलैः । जूझना चाहते हैं, उसी प्रकार ये सब नरेश यादवोंके साथ
प्रध्मायमानैः शङ्खैश्च महाम्बुदसमस्वनैः ॥ १५ ॥ युद्ध करनेकी इच्छा रखते थे ॥ २१-२२ ॥
उनके साथ वारंवार नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । ततो निकुम्भः समरे शरैराशीविषोपमैः ।
उन बाजोंकी आवाजमें रथके नेमियों (पहियों) की घर्घराहट ममर्द समरे सेनां भैमानां भीमदर्शनाम् ॥ २३ ॥
भी मिली हुई थी । वहाँ जोर-जोरसे शङ्ख बजाये जाते थे, जो तब निकुम्भ समराङ्गणमें विषधर सर्पोंके समान भयंकर
महान् मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि प्रकट करते थे १५ बाणोंद्वारा भैर्मों ( यादवों ) की भयानक दिखायी देनेवाली
तासामसुरसेनानामुद्यतानां जनेश्वर । सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया ॥ २३ ॥
निकुम्भो निर्ययावग्रे देवानाामिव वासवः ॥ १६ ॥ सेनापतिरनाधृष्टिर्ममृषे तन्न यादवः ।
जनेश्वर ! युद्धके लिये उद्यत हुई उन असुर-सेनाओंमें ममर्द घोरैर्बाणौघैश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ २४ ॥
सबसे आगे निकुम्भ निकला, मानो देवताओंके आगे इन्द्र यादव-सेनापति अनाधृष्टि निकुम्भके इस पराक्रमको नहीं
चल रहे हों ॥ १६ ॥ सहन कर सके । उन्होंने शिला या सानपर तेज किये हुए
भूमिं द्यां च ववृधिरे दानवास्ते बलोत्कटाः । विचित्र पंखवाले घोर बाणसमूहोंद्वारा उस असुरको
नदन्तो विविधान् नादान् क्ष्वेडन्तश्च पुनः पुनः ॥ १७ ॥ कुचल डाला ॥ २४ ॥
वे उत्कट बलशाली दानव नाना प्रकारसे सिंहनाद करते, न रथोऽसुरमुख्यस्य ददृशे न च वाजिनः ।
बारंबार गरजते तथा आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए न ध्वजो न निकुम्भस्तु सर्वै बाणाभिसंवृताः ॥ २५ ॥
बढ़ने लगे ॥ १७ ॥ उस असुर-सेनापतिका न तो रथ दिखायी देता था न
राजसेनःपि संयत्ता चेदिराजपुरोगमा । घोड़े, न ध्वज और न स्वयं निकुम्भ ही । वे सब-के-सब
असुराणां सहायार्थे निश्चिता जनमेजय ॥ १८ ॥ बाणोंसे ढक गये थे ॥ २५ ॥
जनमेजय ! राजाओकी सेना भी असुरोंकी सहायताके स परीत्य ततो वीरो निकुम्भो मायिनां वरः ।
लिये निश्चय करके चेदिराज शिशुपालके नेतृत्वमें युद्धके लिये अस्तम्भयदनाधृष्टिं मायया भैमसत्तमम् ॥ २६ ॥
तैयार हो गयी ॥ १८ ॥ तब मायावी असुरोंमें श्रेष्ठ वीर निकुम्भने सब ओर
दुर्योधनध्रातृशतं चेदिराजानुजायगम् । चक्कर लगाकर अपनी मायाद्वारा भैँमशिरोमणि (यादवश्रेष्ठ)
स्थितं रथैर्नरव्याघ्र गन्धर्वनगरोपमैः ॥ १९ ॥ अनाधृष्टिको स्तम्भित कर दिया ॥ २६ ॥
पुरुषसिंह ! दुर्योधन आदिसौ भाई चेदिराज शिशुपालके स्तम्भयित्वानयद् वीरं गुहां षट्पुरसंज्ञिताम् ।
छोटे भाइयोंस आगे चल रहे थे। ये सब-के-सब गन्धर्वनगरकार रुद्ध्वा चाभ्यगमद् वीरो मायावलमुपाश्रितः ॥ २७ ॥
रथोंद्वारा युद्धके लिये खड़े थे ॥ १९ ॥ स्तम्भित करके वह वीर अनाधृष्टिको षट्पुर नामवाली
कठिनानादिनो वीर द्रुपदस्यन्दनास्तथा । गुफामें उठा ले गया और वहाँ बंद करके मायावलका
रुक्मी चैवाहितश्चैव तस्थतुर्निश्चितौ रणे । आश्रय लेनेवाला वीर निकुम्भ पुनः युद्धभूमिमें लौट आया २७
तालवृक्षप्रतीकाशे धुन्वानौ धनुषी शुभे ॥ २० ॥ पुनरेव. निकुम्भस्तु कृतवर्माणमाहवे ।
वीर ! राजा द्रुपदके रथ बड़े कठोर (दुःसह) घर- अनयच्चारुदेष्णं च भोजं वैतरणं तथा ॥ २८ ॥
घराहटका शब्द करते थे । रुक्मी और आहुति-ये दोनों सनत्कुमारमृक्षं च तथैव निशठोल्मुकौ ।
युद्धके लिये निश्चय करके वहाँ डट गये । वे ताड़-वृक्षके बहूंश्चैवापरान् भोजान् मायावलसमाश्रितः ॥ २९ ॥
समान अपने सुन्दर धनुष हिलाने लगे ॥ २० ॥ अबकी बार युद्धस्थलमें पुनः मायाबलका आश्रय लेनेवाल
म० ह० १८४-