विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४०१
यथा वै दमितो नागः कालियो यमुनाह्रदे ।
विषाग्निज्वलितो घोरः कालान्तकसमप्रभः ॥ ५० ॥
यमुनाके कुण्डमें निवास करनेवाले घोर कालिय नाग
अपनी विषाग्निसे प्रज्वलित हो काल और अन्तकके समान
प्रतीत होता था, किंतु इन श्रीकृष्णने उसका भी जिस प्रकार
दमन किया ( वह सबको विदित है ) ॥ ५० ॥
केशी चापि महावीर्यो दानवो हयविग्रहः ।
निहतो वासुदेवेन देवैरपि दुरासदः ॥ ५१ ॥
महापराक्रमी केशी नामक दानव घोड़ेका शरीर धारण
करके रहता था । उसको जीतना देवताओंके लिये भी अत्यन्त
कठिन था; परंतु इन भगवान् वासुदेवने उसको भी मार
डाला ॥ ५१ ॥
सान्दीपनिस्तुतश्चैव चिरनष्टो हि सागरे ।
दैत्यं पञ्चजनं हत्वा यानीतो यममन्दिरात् ॥ ५२ ॥
इन्होंने समुद्रमें चिरकालसे नष्ट हुए सान्दीपतिके पुत्र-
को पञ्चजन दैत्यका वध करके यमलोकसे ला दिया था ॥
गोमन्ते सुमहद् युद्धं बहुभिर्वेष्टितावुभौ ।
कृत्वा वित्रासजननं नागाश्वरथसंक्षयम् ॥ ५३ ॥
गजेन गजवृन्दानि रथेन रथयोधिनः ।
सादिनश्चाश्वयोधेन नरेण च पदातिनः ।
जघ्नतुस्तौ महावीर्यौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ५४ ॥
गोमन्त पर्वतपर जो महान् युद्ध हुआ था, उसमें बहुत-से
राजाओंद्वारा यह दोनों भाई घिर गये थे । परंतु वसुदेवके
उन दोनों महापराक्रमी पुत्रोंने हाथी, घोड़े तथा रथोंका
संहाररूप अत्यन्त भयदायक पराक्रम कर दिखाया । हाथीसे
हाथियोंके समूहोंको, रथसे रथारूढ़ योद्धाओंको, घुड़सवारसे
ही घुड़सवारोंको और पैदल योद्धासे ही पैदलोंको मारकर यम-
लोक पहुँचा दिया ॥ ५३-५४ ॥
न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।
न नागा न च दैत्येन्द्रा न पिशाचान् न गुह्यकाः ॥ ५५ ॥
कृतवन्तस्तथा घोरं गजाश्वरथसंक्षयम् ।
तमनुस्मृत्य संग्रामं भृशं सीदति मे मनः ॥ ५६ ॥
देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, यक्षों, सर्पों, राक्षसों, नागों,
दैत्यराजों, पिशाचों और गुह्यकोंने भी कभी हाथी, घोड़े और
रथोंका ऐसा घोर संहार नहीं मचाया था । उस संग्रामको
बारंबार याद करके मेरा मन शिथिल होता जा रहा
है ॥ ५५-५६ ॥
न मया श्रुतपूर्वो वा दृष्टपूर्वोः कुतोऽपि वा ।
तादृशो भुवि मत्योंऽन्यो वासुदेवात् सुरोत्तमात् ॥ ५७ ॥
मैंने पहले कभी भूतलपर सुरश्रेष्ठ भगवान् वासुदेवको
छोड़कर दूसरे किसी वैसे मनुष्यका होना न तो देखा है और
न सुना ही है ॥ ५७ ॥
सम्यगाह महाबाहुर्दन्तवक्त्रो महीपतिः ।
सान्त्वयित्वा महावीर्यं संविधास्याम यत्क्षमम् ॥ ५८ ॥
महाबाहु राजा दन्तवक्त्र ठीक कहते हैं। हम पहले
महापराक्रमी श्रीकृष्णको सान्त्वनाद्वारा शान्त करके फिर
जैसा उचित हो वैसा करे ॥ ५८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति संचिन्त्य मनसा बलाबलबिनिश्चयम् ।
गमनाय मतिं चक्रे प्रसादयितुमच्युतम् ॥ ५९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय ! इस प्रकार
मन-ही-मन अपने बलाबलका निश्चय करके राजा भीष्मकने
भगवान् श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये उनके पास जानेका
विचार किया ॥ ५९ ॥
चिन्तयानो नरेन्द्रस्तु बहुभिर्नयशालिभिः ।
सूतमागधवन्दिभ्यो बोधितः स्तुतिमङ्गलैः ॥ ६० ॥
बहुत-से नीतिशाली विद्वान् मन्त्रियोंके साथ विचार
करते हुए राजा भीष्मक जब रातमें सो गये, तब सबेरा होने-
के समय सूतों, मागधों और वन्दियोंके मुखसे स्तुति एवं
मङ्गल-पाठ सुनकर जगे ॥ ६० ॥
प्रभातायां रजन्यां तु कृतपूर्वाह्निकक्रियः ।
उपविष्टा नृपाः सर्वे स्वेषु विश्रामवेश्मसु ॥ ६१ ॥
जब रात बीतनेपर प्रभातकाल आया, तब सब नरेश
पूर्वाह्नकालके नित्यकर्म पूर्ण करके अपने-अपने विश्राम-भवनों-
में बैठे ॥ ६१ ॥
ये विसृष्टास्तु राजानो विदर्भायां नराधिपैः ।
तैरागस्य स्वभूपेषु रहो गत्वा निवेदितम् ॥ ६२ ॥
राजाओंने अपनी ओरसे जिन-जिन राजकुमारोंको
विदर्भपुरीमें भेजा था, उन्होंने लौटकर अपने-अपने राजाओंके
पास एकान्तमे जाकर वहाँका समाचार निवेदन किया ॥६२॥
श्रुत्वा कृष्णाभिषेकं तु केचिद् धृष्टानराधिपाः ।
केचिद् दीनतरा भीता उदासीनास्तथा परे ॥ ६३ ॥
श्रीकृष्णके अभिषेकका समाचार सुनकर कुछ नरेश तो
बहुत ही प्रसन्न हुए, कुछ लोग अत्यन्त दीन, भयभीत हो
गये और दूसरे राजा उदासीन ( तटस्थ ) बने रहे ॥ ६३ ॥
त्रिधा विभिन्ना सा सेना नरनागाश्वमालिनी ।
महार्णव इव क्षुब्धा अभिषेकेण चालिता ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णके अभिषेकसे चालित हुई मनुष्यों,
हाथियों और घोड़ोंसे भरी हुई वह सेना तीन भागोंमें बँट
गयी और महासागरके समान विक्षुब्ध हो उठी ॥ ६४ ॥
नृपाणां भेदमालोक्य भीष्मको राजसत्तमः ।
व्यतिक्रममचिन्त्यं च कृतं नृपतिना स्वयम् ॥ ६५ ॥