विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] [ एकोनत्रिंशोऽध्यायः १०१
आयुर्वेदं भरद्वाजात् प्राप्येह भिषजां क्रियाम् ।
तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥ २७ ॥
उन्होंने मुनिवर भरद्वाजसे आयुर्वेद तथा चिकित्साकर्मका ज्ञान प्राप्त करके उसे आठ भागोंमें विभक्त किया और उन सबकी विस्तृत विवेचना की । फिर बहुतसे शिष्योंको उस अष्टाङ्गयुक्त आयुर्वेदकी शिक्षा दी ॥ २७ ॥
धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्रुतः ।
अथ केतुमतः पुत्रो वीरो भीमरथः स्मृतः ॥ २८ ॥
धन्वन्तरिके पुत्र केतुमान् नामसे विख्यात हुए । केतुमान्के वीर पुत्रका नाम भीमरथ था ॥ २८ ॥
सुतो भीमरथस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः ।
दिवोदासस्तु धर्मात्मा वाराणस्यधिपोऽभवत् ॥ २९ ॥
भीमरथके पुत्र धर्मात्मा राजा दिवोदास हुए, जो वाराणसीपुरीके स्वामी थे ॥ २९ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु पुरीं वाराणसीं नृप ।
शून्यां निवासयामास क्षेमको नाम राक्षसः ॥ ३० ॥
नरेश्वर ! राजा दिवोदासके राज्यकालमें ही शापवश वाराणसीपुरी जनशून्य हो गयी थी, जिसे पीछे भगवान् रुद्रके अनुचर क्षेमक नामक राक्षसने बसाया था ॥ ३० ॥
शप्ता हि सा मतिमता निकुम्भेन महात्मना ।
शून्या वर्षसहस्रं वै भविष्री नात्र संशयः ॥ ३१ ॥
भगवान् रुद्रके पार्षद बुद्धिमान् महात्मा निकुम्भने यह शाप दे दिया था कि 'वाराणसीपुरी एक हजार वर्षांतक जनशून्य बनी रहेगी । इसमें संशय नहीं है' ॥ ३१ ॥
तस्यां तु शप्तमात्रायां दिवोदासः प्रजेश्वरः ।
विषयान्ते पुरीं रम्यां गोमत्यां संन्यवेशयत् ॥ ३२ ॥
उस पुरीके शापग्रस्त हो जानेपर राजा दिवोदासने अपने राज्यकी सीमापर गोमती नदीके किनारे एक रमणीय नगरी बसायी ॥ ३२ ॥
भद्रश्रेण्यस्य पूर्वं तु पुरी वाराणसीत्यभूत् ।
भद्रश्रेण्यस्य पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् ॥ ३३ ॥
हत्वा निवेशयामास दिवोदासो नरर्षभः ।
भद्रश्रेण्यस्य तद् राज्यं हृतं तेन बलीयसा ॥ ३४ ॥
पहले वाराणसीपुरी (यदुवंशी महिष्मान्के पुत्र) भद्रश्रेण्यके अधिकारमें थी । भद्रश्रेण्यके सौ पुत्र थे, जो श्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते थे नरश्रेष्ठ दिवोदासने उन सबको मारकर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया । उन महाबली नरेशने भद्रश्रेण्यके उस राज्यका बलपूर्वक अपहरण कर लिया ॥ ३३-३४ ॥
जनमेजय उवाच
वाराणसीं निकुम्भस्तु किमर्थं शप्तवान् प्रभुः ।
निकुम्भकश्च धर्मात्मा सिद्धिक्षेत्रं शशाप यः ॥ ३५ ॥
जनमेजयने पूछा—मुने ! वाराणसी तो सिद्धिक्षेत्र (मोक्षधाम) है और प्रभावशाली निकुम्भ बड़े धर्मात्मा हैं। फिर उन्होंने उस पुरीको शाप किस लिये दिया ? ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
दिवोदासस्तु राजर्षिर्नगरीं प्राप्य पार्थिवः ।
वसति स्म महातेजाः स्फीतायां तु नराधिपः ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महातेजस्वी, नरेश्वर राजर्षि दिवोदास वाराणसी नगरीको पाकर वहाँके राजा हो गये । वे उस समृद्धिशालिनी नगरीमें सदा ही निवास करते थे ॥ ३६ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु कृतदारो महेश्वरः ।
देव्याः स प्रियकामस्तु न्यवसच्छ्वशुरान्तिके ॥ ३७ ॥
इन्हीं दिनों भगवान् शङ्कर विवाह करके देवी पार्वतीका प्रिय करनेकी इच्छासे अपने श्वशुरके पास ही निवास करते थे ॥ ३७ ॥
देवाज्ञया पार्षदा ये त्वधिरूपास्तपोधनाः ।
पूर्वोक्तैरुपदेशैश्च तोषयन्ति स्म पार्वतीम् ॥ ३८ ॥
उस समय महादेवजीकी आज्ञासे उनके सुयोग्य पार्षद, जो तपस्याके धनी थे, उनके पहले दिये हुए उपदेशके अनुसार पार्वतीदेवीको संतुष्ट करते रहते थे ॥ ३८ ॥
हृष्यते चै महादेवी मेना नैव प्रहृष्यति ।
जुगुप्सत्यसकृत् तां वै देवीं देवं तथैव सा ॥ ३९ ॥
इससे महादेवी पार्वती तो प्रसन्न रहती थीं, परंतु उनकी माता मेनाको संतोष नहीं होता था । वे महादेवी पार्वती तथा भगवान् शङ्करकी बारंबार निन्दा ही करती थीं ॥ ३९ ॥
सपार्षदस्त्वनाचारस्तव भर्ता महेश्वरः ।
दरिद्रः सर्वदैवासौ शीलं तस्य न वर्तते ॥ ४० ॥
उन्होंने एक दिन कहा—'उमे ! तेरे पति महादेव और उनके पार्षद सभी अनाचारी हैं । साथ ही वे भोलेनाथ सदाके दरिद्र हैं । शील तो उनमें नाममात्रको भी नहीं है' ॥ ४० ॥
मात्रा तथोक्ता वरदा स्त्रीस्वभावान्न चुक्रुधे ।
स्मितं कृत्वा च वरदा भवपार्श्वमथागमत् ॥ ४१ ॥
वरदायिनी उमा माताके ऐसा कहनेपर स्त्रीस्वभाववश कुपित हो उठीं और किंचित् मुसकराकर महादेवजीके पास आयीं ॥ ४१ ॥
विवर्णवदना देवी महादेवमभाषत ।
नेह वत्स्याम्यहं देव नय मां स्वं निकेतनम् ॥ ४२ ॥