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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

युक्त हुआ जीव सोवता है ॥ ५५ ॥ और तमोगुणके योगसे जो वायु होता है वह
स्वप्नावस्था कहाती है और सत्त्वगुण, तमोगुण, वायु ये तीनों स्वप्नावस्थामें एक योगसे
बर्तते हैं ॥ ५६ ॥ आहार, निद्रा, क्षुधा, तृषा, भय, मत्सरपना, मद, मोह, क्रोध,
अभिलाष, सुखकी तृप्ति, शांति ये सब देहधारियोंके होते हैं ऐसे तुम सुनो ॥ ५७ ॥
देहमें विचरताहुआ अग्नि भोजनकी इच्छा कर देता है ॥ ५८ ॥ जठराग्नि जब २
मलोंको शोषती है तब उसकी तृप्ति रहती है और जब उसकी तृप्ति नहीं होती है तब
इसे वांछाको उपजा देती है ॥ ५९ ॥
इति बेरीनिवासिवुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
शारीरस्थाने षष्ठे शारीराध्यायो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ परिशिष्टाध्यायः ।
इति प्रोक्तः शरीरार्थस्तद्व्यासेनोपदिश्यते ॥ श्रुत्वा चैनं महा-
तेजा हारीतो मुनिसत्तमः॥१॥प्रणिपत्य गुरुश्रेष्ठं हृष्टान्तःकरण-
स्ततः ॥ जगाम स्वर्णदीतीरं स्नानध्यानरतस्तथा ॥२॥ य एत-
त् पठति शास्त्रं महर्षेर्वचनाच्छ्रुतम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो नीरुजः
सुखमश्नुते ॥ ३॥ आदौ यद् ब्रह्मणा प्रोक्तमत्रिणा तदनन्तरम्॥
धन्वन्तरिणा प्रोक्तञ्च अश्विना च महात्मना ॥४॥ एवं वेदस-
मं ज्ञेयं नावज्ञाकारणं मतम् ॥ अन्यैश्च बहुधा प्रोक्तं नानाशा-
स्त्रविशारदैः ॥ ५ ॥ अमीषां च मतं ग्राह्यं तस्मात् सर्वे समं
विदुः ॥ चरकः सुश्रुतश्चैव वाग्भटश्च तथापरः ॥ ६॥ मुख्याश्च
संहिता वाच्यास्तिस्र एव युगे युगे ॥ ७॥ अत्रिः कृतयुगे वैद्यो
द्वापरे सुश्रुतो मतः॥ कलौ वाग्भटनामा च गरिमात्र प्रदृश्यते
॥ ८॥ वैष्णवी चाश्विनी गार्गी तत्र माध्याह्निकापरा ॥ मार्क-
ण्डेया च कथिता योगराजेन धीमता ॥ ९॥ संहिता ऋषिभिः
प्रोक्ता मन्त्रैर्नानाविधैर्विभो ॥ १०॥ अग्निवेशश्च भेडश्च जातू-
कर्ण्यः पराशरः ॥ हारीतः क्षारपाणिश्च षडेते ऋषयस्तु ते ॥ ११॥
यथा सिंहो मृगेन्द्राणां यथाऽनन्तो भुजङ्गमे ॥ देवानाञ्च यथा

( ५१२ ) हारीतसंहिता । [ षष्ठस्थानेपरि- ]
शम्भुस्तथात्रेयोऽस्ति वैद्यके ॥१२॥तस्माद्यत्नेन सद्धैद्यैः साद्-
रार्द्रसुमानसः॥ अर्चनीयोऽनुमन्तव्यो दास्यति सुखसम्पदः॥
॥ १३ ॥ इत्यात्रेय भाषिते हारीतोत्तरे परिशिष्टाध्यायः ॥ १॥
इति हारीतसंहिता समाप्ता ॥
इस प्रकारसे आत्रेयजीने शरीरकी चिकित्सा विस्तारसे कह दी तब महान् तेजवाला
उत्तम हारीत मुनि सुनके ॥ १ ॥ उस श्रेष्ठ गुरुको प्रणाम कर अंतःकरणमें प्रसन्न हो देव-
ताओंकी नदीके तीरपै जा वहां स्नान ध्यानमें रत होता भया ॥ २ ॥ महर्षिके वचनोंसे
कहे हुए इस शास्त्रको जो सुनता है वह सब पापोंसे छुटके सुखको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
पहले यह शास्त्र ब्रह्माजीने कहा, पीछे अत्रिमुनिने फिर धन्वंतरिने कहा है और अश्विनी-
कुमारोंने कहा है ॥ ४ ॥ ऐसे वेदमें युक्तहुआ यह शास्त्र चला आता है, निंदित करनेके
योग्य नहीं है और अनेक शास्त्रोंको जाननेवाले अन्य बहुतसे ऋषियोंने अनेकप्रकारसे कहा है
॥ ५॥ इन आगे कहे हुए ऋषियोंका मत है इसवास्ते सबको माननेलायक है। चरक,
सुश्रुत, वाग्भट इत्यादिक ॥ ६ ॥ मुख्य ऋषियोंसे यह संहिता युग २ में कही हुई है
॥ ७ ॥अत्रिमुनि सत्ययुगमें वैद्य होते भये और द्वापरमें सुश्रुत होते भये और कलियुगमें वाग्भ-
टनामवाला महान् वैद्य दीखता है ॥ ८ ॥ वैष्णवी, आश्विनी, गार्गी, माध्याह्निका,
मार्कण्डेया, ये संहिता योगराजने कही है ॥ ९ ॥ आयुर्वेद संहिता ऋषियोंने अनेक
प्रकारके मंत्र और औषधोंसे युक्त करदी है ॥ १० ॥ अग्निवेष, भेड, जातूकर्ण्य,
पराशर, हारीत, क्षीरपाणि, ये छह ऋषि कहे हैं ॥ ११ ॥ जैसे मृगोंमें सिंह है और
सर्पोंमें शेष नाग है, देवताओंमें शिवजीहैं वैसेही वैद्योंमें आत्रेयमुनि उत्तम हैं ॥ १२ ॥ इस
वास्ते यत्नसे उत्तम वैद्योंकी आदरसे सुन्दर मनसे अत्रिमुनि पूजन करनेको योग्य हैं और
माननेको योग्य हैं वे सुख संपत्ति इनको देवेंगे ॥ १३ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
परिशिष्टाध्यायः ॥ १ ॥
इति हारीतसंहिता संपूर्णा ।
पुस्तक मिलनेका पता-
खेमराज श्रीकृष्णदास, { गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास,
“श्रीवेंकटेश्वर” स्टीम् प्रेस-बम्बई. { “लक्ष्मीवेङ्कटेश्वरप्रेस” कल्याण-मुम्बई.

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17 FEB. 1938
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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