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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 548 में से

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पृष्ठ 76

( ४४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
दिनमें सूर्यके किरणोंसे तप्त हुए जो मेघ पानी वर्षाते हैं वहकफको नाशता है, प्यासको हरता
है, हलका है, वातको कुपित करता है ॥ १५ ॥
अथ दुर्दिनमें बरसे पानीके गुण दोष वर्णन ।
दुर्दिने वृष्टिसम्पातं वातभूतं सवातलम् ॥
कफकृच्छोषहननं तर्पणं दोषकोपनम् ॥ १६ ॥
दुर्दिनमें वर्षा हुआ पानी वातल है, कफको करता है, शोषको हरता है, तृप्तिको, करता है।,
दोषोंको कुपित करता है ॥ १६ ॥
अथ क्षणवृष्टिके गुण ।
तथा वा क्षणवृष्टिश्च दोषरोगकरी नृणाम् ॥
कण्डूत्रिदोषजननं पानीयं न प्रशस्यते ॥ १७ ॥
जो क्षण क्षण में वृष्टि होती है वह वर्षा मनुष्योंके दोषको और रोगको करती है और इसका
पानी खाजको और त्रिदोषको उपजाता है और अच्छा नहीं है ॥ १७ ॥
अथ श्रावणवृष्टिके गुण ।
मेघा वमन्ति यत्तोयं सशैलवनकानने ॥
श्रावणे निन्द्यते भूमौ कराम्बु वर्षते रविः ॥ १८ ॥
जो श्रावणके महीनेमें सूर्य अपनीकिरणोंसे पर्वत,वन, उपवन और पृथ्वीमें वर्षा करताहै,
वह निंदित जल होता है ( करांबु वर्षते रविः ) इसका अर्थ हस्तनक्षत्रपर सूर्य होता है और
श्रावणमें मेघ वर्षता है वह निंदित है ऐसा कहते है ॥ १८ ॥
अथ भादोंके वृष्टिके गुण ।
सघनं नाभसं नीरं श्लेष्मकृद्वातकोपनम् ॥
शमनं पित्तरोगणां मधुरं रक्तदोषकृत् ॥ १९ ॥
भादोंकी वर्षाका पानी गाढ़ा है, कफको करता है, वातको कोपता है, पित्तके रोगोंको शांत
करता है, मधुर है और रक्तदोषको करता है ॥ १९ ॥
अथ आश्विनीकी वृष्टिके गुण ।
रूक्षं पित्तकरं चाम्लं गुल्मरक्तविकारकृत् ॥
चित्रानक्षत्रसम्भूतं खरं सस्यविदोषकृत् ॥ २० ॥
आश्विनमें हुई वर्षाका पानी रूखा है, पित्तको करता है, खट्टा है, गुल्मको और रक्तके विका-
रको करता है, चित्रा नक्षत्रमें वर्षा हुआ पानी तेज है और खेतीके दोषको करता है ॥ २० ॥