सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

: ( ३८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
योश्च ॥ ६६ ॥ यस्मिन्मरुत्कुप्यति सेवते यः पित्तस्य कोपप्र-
कराणि यानि ॥ विपर्य्ययो वा ऋतुधान्ययोश्च स पित्तवातप्रभ-
वस्तदा स्यात् ॥ ६७ ॥
जब विपरीतपनेको ऋतु प्राप्त हो जावे तब जिसका कोप जैसे कहा है उसको सेवने-
वाले मनुष्यके द्वंद्वज अर्थात् दो दोषोंसे उपजा रोग उत्पन्न होता है ॥ ६५ ॥ जिस ऋतुमें
वायुका कोप कहा है उस ही ऋतुमें जो कफको कुपितकरनेवाले पदार्थोंको मनुष्य सेवे तब उस
मनुष्यके कफका और पित्तका कोप होता है ॥ ६६ ॥ जिस ऋतुमें वायु कोपता है उस ऋतुमें
पित्तको कुपित करनेवाले पदार्थोंको सेवें अथवा ऋतुका और ऋतुके योग्य अन्नका विपरीतपना
होवे तब पित्त वातसे उपजा रोग होता है ॥ ६७ ॥
अथ सन्निपातकी उत्पत्ति ।
विपर्य्यासगते काले रसे विपरिसेविते ॥ तदा स्यात्सन्निपातो
हि रोगोपद्रवकारकः ॥ ६८ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे
दोषप्रकोपो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
जब काल विपरीतपनेसे वर्त्ताव करे और रस भी विपरीतपनेसे सेवित किया जावे तब सन्नि-
पात उपजता है यह रोगमें उपद्रव करता है ॥ ६८ ॥ इति बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्रि-
अनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने दोषप्रकोपो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ६.
अथ रसोंके गुणदोषका वर्णन ।
अथातः संप्रवक्ष्यामि रसानाञ्च गुणागुणान् ॥
येन विज्ञानमात्रेण रसानां गुणविद्भवेत् ॥ १ ॥
इसके अनन्तर रसोंके गुण और दोषको कहता हूं जिसके जाननेसे ही रसोंके गुणको
जाननेवाला होजाता है ॥ १ ॥
छः रस ।
तिक्तः कषायो मधुरोऽम्लकश्च क्षारः कटुः षड्रसनामधेयम् ॥
द्वयं द्वयं वातकफप्रकोपनं द्वयं तथा पित्तकरं वदन्ति ॥ २ ॥
मधुर, कसैला, कडुवा, खट्टा, खारा, चर्बरा ऐसे छः प्रकारके रस हैं इन्होंमें दो दो रस
वात और कफको कोपते हैं और दो रस पित्तको करते हैं ॥ २ ॥
१ अस्मिंस्तृतीयचरणे एकाक्षराधिक्यमस्ति ।