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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 542

( ५१० ) हारीतसंहिता । [ षष्ठस्थाने-
प्रसुः॥ तमसा प्रवृत्तो देही व्योमेन शून्यतां गतः ॥५२॥ देहं
विश्रमते यस्मात्तस्मान्निद्रा प्रकीर्त्तिता ॥ नासार्द्धे च भ्रुवोर्मध्य
लीयते चान्तरात्मना ॥५३॥ तस्माच्चेतो भवेत्तत्रनिद्रा व्याली-
यते नृणाम्॥५४॥॥सत्त्वात्तेजःसमाख्यातं तेजसा पित्तमेव च ॥
जायते वायुर्मनसः स्वपते तमसा वृतः ॥५५ ॥ वायोस्तमः
समायोगात्स्वभावस्थेति गीयते ॥ सत्त्वं तमस्तथा वायुर्वर्त्तते
चैकयोगतः॥५६॥ आहारनिद्रा च क्षुधा च तृष्णा भयञ्च
मात्सर्य्यमदश्च मोहः ॥ क्रोधाभिलाषः सुखतृप्तिशान्तिर्भवन्ति
वै देहभृतां शृणु त्वम् ॥ ५७ ॥ आहारस्येच्छया देहे विचरते
हुताशनः॥ तृप्तिं वापि समाप्नोति रसस्वादरजस्य च ॥५८॥
यदा यदा शोषयते मलानामग्निरस्तदा तृप्तिमिवानोति॥ यदा
च यस्यैव भवेदतृप्तिस्तदैव तृष्णां प्रतनोति चेतः ॥ ५९ ॥
इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे शारीरस्थाने शारीराध्यायो नाम
प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इति शारीरस्थानं समाप्तम् ॥
आकाशसे जलतत्त्व होता है उससे पृथ्वी होती है उससे अग्नितत्त्व होता है अग्निसे
तमोगुण होता है ॥ ४९ ॥ पंचभूतात्मक तथा पांच इंद्रियोंसे युक्त ऐसे शरीरमें जो
तत्त्वोंमें प्रधान है वह आकाश कहाता है ॥ ५० ॥ आकाशसे अग्नि होता है अग्निसे अभि-
मान होता है उससे पराक्रम होता है उससे अहंकार अहंकारसे क्रोध होता है उससे तमो-
गुण और तमोगुणसे पाप होता है और आकाशसे सत्त्वगुण उससे सत्य सत्यसे तप तपसे
नीति नीतिसे विवेक विवेकसे शांति शांतिसे धर्म होता है और सत्त्वसे रजोगुण होता है
रजोगुणसे कामना कामनासे चंचलपना होता है चंचलपनेसे असत्य और असत्यसे पाप होता
है और रससे कामना कामसे अभिलाषा अभिलाषासे प्रजा अर्थात् संतान और प्रजासे मित्र-
भाव होता है उससे स्नेह स्नेहसे माया होती है उससे भ्रांति भ्रांतिसे मिथ्या उससे अविद्या
और अविद्यासे पुण्य तथा पाप दोनों होते हैं फिर पुण्यपापोंसे जन्म होता है ॥ ५१ ॥
सत्त्वगुणसे तमोगुण होता है वह जाग्रत् अवस्था तथा स्वप्न अवस्थामें बलवंत है और तमो-
गुणसे प्रवृत्त हुआ जीव आकाशके संग शून्यभावको प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥ तब देहको
विश्राम देता है उसको निद्रा कहते हैं, नासिकाका अर्द्धभाग और भ्रुकुटिमध्य वहां अंतरात्माके
संग लीन होता है ॥ ५३ ॥ वहां चित्त रहताहै उससे मनुष्योंकी निद्रा दूर होती है ॥५४॥
और सत्त्वगुणसे तेज तेजसे पित्त होता है और मनसे वायु उत्पन्न होता है और तमोगुणसे