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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 548 में से

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पृष्ठ 536

आत्रेयजी कहते हैं-पांच तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाला पांच इंद्रिय और सात धातु तथा
दश वायुओंसे युक्त ऐसे देहको कहते हैं ॥ १ ॥ जीव, मन, आकाश, ऐसे त्रिगुणात्मक शरीर
है, वीर्य्य और शोणितसे उपजे हुए शरीरको दोषका पात्र कहते हैं । हे उत्तमवैद्य ! पांच तत्त्वोंसे
उत्पन्न होनेवाला शरीर जान ॥ २ ॥ चार प्रकारका शरीर होता है, बालक १, जवान २,
प्रगल्भ ३, वृद्ध ४, ऐसे चार प्रकारका कहा है, वहां बालक अल्पशरीर कहा है जबतक
सोलह वर्षका हो तब तक बालक अवस्था रहती है ॥ ३ ॥ शरीरमें धातुओंका बल
होता है और धातुओंकी जड़वाला शरीर कहा है और धातुओंकी पुष्टिके योगसे
शरीर अत्यंत बढता है ॥ ४ ॥ जीवन धातुओंकी जड़से है और धातुक्षय होनेसे मृत्यु हो
जाती है और हीन धातुके योगसे थोडा जीवन होता है ॥ ५ ॥ मनुष्यका जीवन धातुकेही
बलसे दीखता है इस वास्ते मैथुनसे सम्यक् प्रकारसे गर्भ स्थित होता है ॥ ६ ॥ पहले
धातुका बल, उससे सत्त्वगुण, सत्त्वगुणसे रजोगुण, उससे काम व कामसे मैथुनका संगम होताहै
॥ ७ ॥ महीना२ के प्रति ऋतु अर्थात् स्त्री रजस्वला धर्ममें होती है । हे उत्तमवैद्य ! सात दिन-
तक स्त्रियोंके रज रहता है तबतक ऋतुसमय कहाता.है ॥ ८ ॥ और सात रात्री पीछे योनिकी
शुद्धि हो जाती है तब वह ऋतुमती कहाती है हे पुत्र ! स्त्रियोंके रज बिनाही योगसे होता है
॥ ९ ॥ फल अर्थात् गर्भस्थिति संयोगके बिना नहीं होती है ऐसे सुनके सन्देहमें युक्त हो
हारीत फिर पूछता भया ॥ १० ॥
हारीत उवाच ॥ संयोगेन विना प्राज्ञ कथं गर्भो न जायते ॥
संयोगेन विना पुष्पं फलं वा न कथं भवेत्॥ ११॥वृक्षवन्न कथं
स्त्रीणां फलोत्पत्तिः प्रदृश्यते ॥ एतत्पृष्टो महाचार्य्यः प्रोवाच
ऋषिपुङ्गवः ॥ १२ ॥
हारीत पूछने लगा-हे महाराज ! संगयोके बिना स्त्रियोंके गर्भ क्यों नहीं ठहरता है
क्योंकि संयोगके बिना पुष्प तो हो गये फिर फल भी क्यों नहीं होता है ? ॥ ११ ॥ वृक्षकी
तरहस्त्रियोंके भी गर्भकी उत्पत्ति क्यों नहीं होती ऐसे पूछा हुआ ऋषियोंमें उत्तम महान्
आचार्य फिर बोलता भया ॥ १२ ॥
आत्रेय उवाच ॥ विरुद्धानाञ्च वल्लीनां स्थावराणाञ्च पुत्रक॥
तत्र धातुसमं बीजं सह योगेन वर्त्तते ॥ १३ ॥ न भिन्नदृष्टि-
स्तस्येव दृश्यते शृणु पुत्रक॥स्थावराणाञ्च सर्वेषां शिवशक्ति-
मयं विदुः ॥ १४ ॥ निश्चलोऽपि शिवो ज्ञेयो व्याप्तिशक्तिर्महा-
मते ॥ तत्र स्त्रीपुरुषगुणा वर्त्तते समयोगतः ॥ १५ ॥ आम्र-
पुष्पं फलं तद्वद्वीजं शुक्रमयं विदुः॥स्त्रीणां रजोमयं रेतो बीजा-