हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४९९ )
पित्तरोगे पिबन्नरः॥ २१ ॥ राजयक्ष्मक्षये पाण्डौ कामलायां
हलीमुके ॥ शिरोरुजासु सर्वासु रक्तपित्तभ्रमेषु च॥२२॥ शोष-
मूर्च्छापस्मारे च हितं चैतद्रसायनम् ॥ २३ ॥
हे उत्तम मुनि ! लहसनके रसको निचोड़ उसमें दूब और खांड़ मिला पीनेसे पित्तरोग
शांत होता है ॥ २१ ॥ और राजयक्ष्मा, क्षयरोग, पांडुरोग, हलीमक, संपूर्ण शिरके रोग और
रक्तपित्तसे उपजे भ्रम ॥ २२ ॥ शोष, मूर्च्छा, मृगीरोग इनमें हित है और रसायन है ॥ २३॥
परिपिष्य रसोनञ्च तत्समा त्रिवृता मता ॥ गुडैर्नैरण्डतैलेन
शीतं दत्त्वा च लेहकम्॥ २४ ॥ भवत्येतत्समाहृत्य पायये-
न्मूत्ररोगिणाम् ॥ शोफे गुल्मे वाऽऽमवाते हितमेतत्तदार्शसाम्
॥२५॥हरिणशशकलावातित्तिराणाञ्च मांसं ह्यथ च अज-
शिखीनां कर्करासारसानाम्॥घृतमधुररसानां शालिगोधूममासां
हितमिति मनुजानां गुग्गुले वा रसोने॥२६॥व्यायामयानात-
पमैथुनानि क्रोधाध्वजीर्णानपरिवर्जयेच्च॥विवर्जयेद्वापि तथा-
तिसारे मेहामये पाण्डुगुदामये च ॥ २७॥ न गर्भिणीनां न
च बालकानां अमातुरे वा न मदातुरे च ॥ न रक्तपित्ते न च
कुष्ठिनेऽपि न रक्तवाते न विसर्पके च ॥२८॥ दत्तो रसोनी यदि
मूढबुद्ध्या विरेचनं वा वमनं विधेयम्॥न वान्यथा कुष्ठमथापि
पाण्डुं त्वद्दोषरोषं कुरुते नरस्य ॥ सुयोग्युक्त्याऽमृतवन्नराणां
वीर्येन्द्रियं पुष्टिबलं तनोति ॥ २९ ॥ इत्यात्रेयभाषिते
हारीतोत्तरे कल्पस्थाने रसोनकल्पो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४ ॥
लहसनको पीस उसके समान निशोत मिला और गुड, अरंडीका तैल, दालचिनी,
इनका अवलेह बनादेनेसे ॥ २४ ॥ मूत्ररोगवाले पुरुषोंके सुख होता है और शोजा,
गुल्म, आमवात, बवासीर इन रोगवालोंको हित है ॥ २५ ॥ हिरन, शशा, लावा
तीतर, ककेरा, मोर, सारस, बकरा इत्यादिकोंका मांस, घृत, मधुररस, शालिसंज्ञक चावल,
गेहूं इनका भोजन करना गूगल तथा लहसन खानेके पीछे हित कहा है ॥ २६ ॥
कसरत, गमन करना, घाम सेवना, मैथुन करना, क्रोध, मार्गका श्रम इनको वर्ज देवे और
अतिसार, प्रमेह, पांडुरोग, गुदाके रोग इन रोगोंमें लहसन नहीं देना ॥ २७ ॥ गर्भिणी
स्त्री, बालक, अमातुर पुरुष, मदातुर, रक्तपित्तवाले, कुष्ठवाले, रक्तवातवाले, विसर्प रोगवाले