सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 53

अ० ४] भाषाटीकासमेता । (२१)
उत्तरायणका लक्षण ।
यदोदीच्यां गतिर्भानोस्तदा सूर्यो जलाधिपः ॥ २६ ॥
तस्मादुष्णगुणास्तीव्राः सम्भवन्ति विदाहिनः ॥ खरसूर्यां-
शुजालैस्तु शुष्यते वनकाननम् ॥२७॥ संशुष्का मेदिनी सर्वा
दिशः पानादनीरसाः॥बलिनोऽम्लकषटुक्षाराः सम्भवन्ति विदा-
हिनः ॥ २८ ॥ तस्मात्संंकुप्यते पित्तं रक्तेन सह मूच्छितम् ॥
संशुष्क ओषधिरसो गोजातीनां पयांसि च ॥ २९ ॥ अल्पं
बलं च जन्तूनां कथञ्चित्कफसम्भवः ॥ दृश्यते च वसन्ते च
स्वयमेव शमं व्रजेत्॥३०॥ एवं ज्ञात्वा सुधीः सम्यक्कुर्यात्सर्व-
प्रतिक्रियाम् ॥ ३१ ॥
जब उत्तर दिशामें सूर्य्यकी गति होती है तब सूर्य्य जलोंका स्वामी हो जाता है ॥ २६ ॥
इसलिये उष्णगुणवाले तीव्र और विदाही पदार्थ होते हैं ॥ २७ ॥ और संपूर्ण पृथिवी सूख
जाती है और जल आदिसे रहित सब दिशा हो जाती हैं और खट्टा, चर्चरा, खारा ये रस बलवाले
और विशेष करके दाहको करनेवाले होते हैं ॥ २८ ॥ उससे रक्तके साथ मूच्छित हुआ
पित्त कुपित होता है और ओषधियोंका रस और गाय आदिका दूध सूख जाता है ॥ २९ ॥
और जीवोंमें अल्प बल उपजता है और कदाचित् कफकी भी उत्पत्ति होजाती है और
वहां कफकी उत्पत्ति वसंत ऋतु अर्थात् चैत्र वैशाखमें दीखती है और आप ही शांत हो जाती
है ॥ ३० ॥ ऐसे अच्छी तरह वैद्य जानके सब रोगोंकी चिकित्साको करे ॥ ३१ ॥
अथ वर्षर्तुका लक्षण ।
सघनवारिद्वारिसमाकुला अखिलवत्प्रवरोदकपूरिताः॥समद्-
वातकरा विदिशो दिशः प्रमुदितक्रिमिकीटभृता मही ॥३२॥
नीलसस्यहरितोज्ज्वला मही कुल्यका सलिलसंप्लुता नवा ॥
इन्द्रगोपकविराजिता वरा पङ्कभूषणविभूषिता धरा ॥ ३३ ॥
उद्भिन्नचूताङ्कुरभूधरः स्याद्वेजे वनं वा मधुरं व्यकूजन् ॥ भृङ्ग
मयूरा जलदस्य घोषं सर्वेऽपि जीवा बलमाप्नुवन्ति॥३४॥केकी
कूजति कानने च सरसी म्लानाम्बुपूर्णा तथा हंसा मानसमात्र-
जन्ति कमलान्यम्म्लानतां यान्ति च॥गर्जन्मेघमहेन्द्रकन्दर-