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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 522

( ४९० ) हारीतसंहिता । [ पञ्चमस्थाने-
उत्पत्तिनामानि वक्ष्यामि शृणु कोविद् ॥ १० ॥ विजया
रोहिणी चव पूतना चामृता तथा ॥ चेतकी चाभया चैव
जीवन्ती चैव सप्तमी ॥ ११ ॥ विन्ध्ये च विजया जाता
अभया च हिमालये ॥ रोहिणी वैदिशे जाता पूतना मगधे
स्मृता ॥१२॥ जीवन्तिका सुराष्ट्रायां चम्पायां चेतकी मता ॥
अमृता सरयूतीर इत्येताः सप्त जातयः ॥१३॥ अभया नेत्र-
रोगेषु शिरोरोगेषु कालिका ॥सर्वप्रयोगेविजया रोहिणी क्षतरो-
हिणी ॥ १४ ॥ पूतना लेपनार्थे च अमृता च तथा मता ॥
चेतकी सर्वतो योज्या जीवन्ती चूर्णयोगतः ॥१५॥ बालानामु-
पकारार्थं विजयां परिलक्षयेत् ॥ त्र्यस्रा च रोहिणी प्रोक्ता
अमृता स्थूलमांसला ॥ १६ ॥ पञ्चास्रा चाभया प्रोक्ता पूतना
चतुरस्रका ॥ त्र्यस्रा तु चेतकी प्रोक्ता जीवन्ती दीर्घमांसला ॥
॥ १७ ॥ विजया नीलवर्णा च पीता स्याद्रोहिणी भिषक् ॥
अमृता कृष्णवर्णा च किञ्चिच्छुभ्राभया तथा ॥१८॥ सार्द्ध-
द्वयङ्गुलमानेन अमृतां लक्षयेद्बुधः ॥१९॥ पथ्या भवेत्पथ्य-
तमा नराणां रोगांश्च सर्वान्विनिहन्ति सद्यः ॥ आयुःप्रदा तुष्टि-
मतीवमेधावर्णौजतेजःस्मृतिमातनोति ॥ २० ॥ उन्मूलिनी पि-
त्तकफानिलानां सन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणाम् ॥ विस्रंसिनी
मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी रोगहरा नराणाम् ॥२१॥ इत्यात्रे-
यभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पो नाम प्रथमो-
ऽध्यायः ॥ १ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-कल्पोंमें हरड़ै श्रेष्ठ हैं उसके गुण अवगुणोंको सुनो ॥ ४ ॥
स्वर्गमें स्थित हुए इंद्रके अमृत पीवते हुए पृथ्वीमें अमृतकी बिंदु गिरती भयीं उनसे हरड़ैं उत्पन्न
होती भयीं ॥ ५ ॥ वह पाँच रसोंसे संयुक्त है और एक रससे रहित है, कसैली, खट्टी, चर्चरी,
कडुई और मधुर रसवाली कही है, नमकके रससे वर्जित है उसके जुदे २ लक्षणोंको सुनो
॥ ६ ॥ इसकी त्वचा चर्चरी है और इसका मेद कसेला है मेदके भीतर खट्टापन है, अस्थि