हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४८७ )
चार अंगुल जगहको त्यागके नाड़ीको वींधै, चार अंगुल जगहको त्याग अतिसमीपकी नसको
नहीं वींधे और पैरमें टांकनेकी नसोंको वींधे और अन्य प्रकरण ग्रन्थके विस्तार होनेके भयसे
नहीं कहा है । इस प्रकरणमें तुम्बी सींगी इत्यादिकोंसे रुधिरका निकसाना सबको ज्ञात है और
श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥
अथ रक्तलक्षण ।
सकृष्णं फेनिलं श्यामं रक्तं तद्वातदोषजम् ॥ सर्वलक्षणसंपन्नं
विज्ञेयं तन्त्रिदोषजम् ॥५॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुर्थे
सूत्रस्थाने रक्तावसेचनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
जो काला तथा झागोंवाला रक्तहो वह वातके दोषका रुधिर जानना, जो सब लक्षणोंसे संयुक्त हो
वह त्रिदोषसे रुधिर जानना ॥ ५ ॥ इति वेरीनिवासिशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादि-
तहारीतसंहिताभाषाटीकायां चतुर्थे सूत्रस्थाने रक्तावसेचनविधिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ६.
अथ जलौकाचारविधि ।
आत्रेय उवाच ॥ जलौकाश्चतुर्विधाः प्रोक्ता इन्द्रायुधा रोहिणी
कालिका धूम्रा चेति ॥ १ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-जोंक चार प्रकारकी कही हैं इंद्रायुधा १ रोहिणी २ कालिका ३
धूम्रा ४ ॥ १ ॥
अथ इंद्रायुधाके लक्षण ।
नीलवर्णा पार्श्वेरक्ता तीक्ष्णमुखी गम्भीरनिर्मलोदके पाषाण-
सन्धौ च प्रविशति ॥ तया विद्रध्युदरदाहशोफमूर्च्छाविषायुप-
द्रवयति ॥ २ ॥
जो नीलवर्णवालीहो, पशलियोंकी ओर लालहो, तीक्ष्णमुखवाली हो यह जोक गंभीर
निर्मलजलमें और पर्वतकी संधिमें रहती है इसकरके विद्रधि, उदररोग, दाह, शोष, मूर्च्छा,
विष इत्यादिकोंको करती है ॥ २ ॥
अथ रोहिणीके लक्षण ।
नीलवर्णा पार्श्वपीता शङ्खमुखी पद्मनाले प्रविशति ॥
तया विद्रधिविसर्पशोफायुपद्रवयति ॥ ३ ॥