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सर्वकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 548 में से

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पृष्ठ 476

( ४५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
चर्चरा, खट्टा, तीक्ष्ण ऐसे भोजनको वर्ज दे और गरम, विदाही, रूषा ऐसा भोजन, कांजी
इनको वीर्यक्षयमें वर्ज देवे ॥ १८ ॥ प्याज, तथा अन्यकंद, उड़द, और शालीसंज्ञक चावलों-
का भात, दूध, ईखका रस ॥ १९ ॥वथुआका शाक और चिल्लक अर्थात् अन्य बथुआका भेद
इनको अग्नि बलके अनुसार खावे ये वीर्यक्षयमें पथ्य हैं और जमीकंद, सोंठ, इनको नहीं देवे
॥ २० ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविद्त्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने वाजीकरणं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ४८.
अथ वन्ध्यारोगके लक्षण ।
आत्रेय उवाच॥वन्ध्या स्यात्षट्प्रकारेण बाल्येनाप्यथवापुनः॥
गर्भकोशस्य भङ्गाद्वातथाधातुक्षयादपि॥१॥जायतेनचगर्भस्य
सम्भृतिश्च कदाचन॥ काकबन्ध्या भवेच्चैका अनपत्या द्विती-
यका ॥२॥ गर्भस्रावी तृतीयाऽथ कथिता मुनिसत्तमैः ॥ मृत-
वत्सा चतुर्थी स्यात्पञ्चमी च बलक्षयात् ॥३॥ तस्योपक्रमणं-
वक्ष्ये येन सा लभते सुतम् ॥ ४ ॥ अजातरजसां स्त्रीणां
क्रियते यदि मैथुनम्॥ तेनैव गर्भसंकोचं भगत्वमुपगच्छति ॥
॥५॥ तेन स्त्री भवते वन्ध्या गर्भं गृह्णाति नो भृशम् ॥ सा च
कष्टेन भवति रामा गर्भवती भिषक् ॥६॥ औषधैश्चोपचारैश्च
सिद्धिश्चापि न संशयः॥अनपत्यबलेनापि जायते भिषजां वर
॥७॥न भवेत्काकबन्ध्या च अनपत्यापि सिध्यति॥सिध्यन्ती
क्षीणधातुत्वाज्जायते सा भिषग्वर ॥ ८ ॥
आत्रेयजी कहतें हैं-वंध्या रोग छह प्रकारका होता है, बालक अवस्था में गर्भक्रोशके
भंग होजानेसे अथवा धातुके क्षय होनेसे ॥ १ ॥ गर्भ कदाचित्भी नहीं ठहरता है और एक
तो काकबन्ध्या होती है दूसरी अनपत्या होती है॥ २ ॥ तीसरी गर्भस्रावी होती है, चौथी
मृतवत्सा होती है और पांचवीं बलके क्षय होनेसे होती है ॥३॥ अब इनकी चिकित्सा कहते हैं
जिसकरके सुख उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥ जो यदि रजस्वला नहीं हुई हो ऐसी स्त्रीके संग
मैथुन कर लेवे तो गर्भस्थान भगमें संकोचको प्राप्त हो जाता है ॥ ५ ॥ उसकरके
स्त्री वंध्या हो जाती है विशेषकरिके गर्भको धारण नहीं करती है हे वैद्य ! वह स्त्री