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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 548 में से

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पृष्ठ 467

अ० ४९ ] भाषाटीकासमेता । ( ४३५ )
मनशिल, इनको समान भाग ले बकरीके दूधमें पीस ॥ १९ ॥ अंजन घालनेसे तिमि-
ररोग, नेत्रकी खाज, नेत्रके पटलदोष, अर्बुद रोग, नेत्रका फूला, पटलमें प्राप्त हुआ फूला,
रतौंधा, इनका नाश होता है ॥ २० ॥ चोटआदिके अभिघातसे, शोकसे, तथा अग्निसे
दग्ध हुआ काचपटल और नीलिका इन नेत्ररोगोंकी भी सिद्धि होजाती है ॥ २१ ॥
अथ नेत्रपटलका लक्षण ।
बाल्याद्दोषबलादेव दुष्टाहाराभिषेवणात् ॥ वार्द्धक्याच्च पटलं
स्यात्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २२ ॥ वातात्सकश्मलं रूक्षं
पित्तान्नीलं च पीतकम्॥ कफेन शुभ्रं सघनं रक्तान्नारक्तकं विदुः
॥२३॥ सन्निपातादिलिङ्गश्च अतो वक्ष्यामि भेषजम् ॥२४ ॥
बालक अवस्थासे दोषके बलसे और दूषित भोजन खानेसे वृद्ध अवस्थामें नेत्रमें पटल
होजाता है तिसके लक्षणको कहते हैं ॥ २२ ॥ वातसे उपजा मैला हो और पित्तसे नीला-
वर्णवाला हो अथवा पीला हो और कफसे करडा हो, सफेद हो और रक्तके दोषसे लाल पटल
होजाता है ॥ २३ ॥ और सन्निपातसे उपजे हुएमें मिले हुए लक्षण होते हैं अब इन्होंकी
औषधको कहते हैं ॥ २४ ॥
अथ नेत्रपटलचिकित्सा ।
शुण्ठीवचारजनितुत्थमनःशिला चशोभाञ्जनाञ्जनविशालजटा
च शंखम्॥वास्तूकमूलमधुसैन्धवकट्फलानां सौवीरकेण परि-
मर्दनवर्तिरेषा ॥२५॥ छायाविशुष्कनयनाञ्जनके प्रशस्तं नाशं
नयेत्पटलनेत्ररोगसङ्घात् ॥२६॥साञ्जना कट्फला चैव हरी-
तकि मनःशिला॥गुडेन कट्फलश्चापि निहन्ति नेत्रप्रच्छदम्
॥ २७ ॥ महाविभीतकफलस्य च शङ्खनाभि घृष्टं ससैन्धवयुतं
पयसाम्लकेन॥वर्तिर्गुडेन नयनाञ्जनके हिता च पित्तप्रसूतपट-
लस्य निवारणश्च ॥ २८ ॥
सोंठ, वच, हलदी, नीलाथोथा, मनसिल, सहिंजना, काला सुरमा, इंद्रायण, जटामांसी,
शंख, बथुवाकी जड, शहद, सेंधानमक, कायफल इनको कांजीमें खरल करि बत्ती बना
॥ २५ ॥ छायामें सुखा नेत्रोंमें आंजनी श्रेष्ठ कही है. पटलरोग, अन्य नेत्र रोगोंका समूह
इनको नाश करती है ॥ २६ ॥ और काला सुरमा, कायफल, हरड़ै, मनसिल इनको
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu