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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 464

( ४३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
हारीणि पथ्यानि विदाहीनि गुरुणि च ॥ १५ ॥ इत्यात्रेयभा-
षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने कर्णरोगचिकित्सानाम चतुश्चत्वा-
रिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
कानके रोगमें जल पूरना और चूर्ण पूरना हित नहीं कहा है। कानरोगमें तैल पूरना और पसीना
दिवाना हित है और भाफ दिवानेका कर्म हित कहा है ॥ ७ ॥ सेंधानमक, समुद्रफेन, इनका
बारीक चूर्ण बना कांजीके रसमें मिला वातसे उपजे कानके रोगमें हित है ॥ ८ ॥ ओदेवेरोंका
रस, सोंठ, सेंध्वानमक, गूगल, उड़दोंके बाकले इनमें तेलको पका गरम गरम ॥ ९ ॥ उस
तेलके पुरानेसे कानका रोग दूर होता है इस तेलको कडुई तुंबीमें घालके घरे ॥ १० ॥ मुलहटी,
कूंठ, नींवके पत्ते, हलदी, इन्द्रायणके पुष्प तथा कोमल २ पत्ते, इनमें घृतको पका पित्तसे उपजे
कर्णशूलमें पूरण करना श्रेष्ठ है ॥ ११ ॥ ब्राह्मीका रस सेंधानमक, वायविडंग, मंगरेका रस, घृत,
कांजीका रस, हरडै, इनको पका पीछे वस्त्रमें छान कानमें पूरनेसे ॥ १२ ॥ क्रिमियोंसे उपजी
कानमें रक्तसहित पीवका नाश होता है और कानमें पूरन करनेमें यह हित कहा है ॥ १३ ॥
जितने शिरके रोग कहे हैं उनमें तैल और घृतमें सिद्ध किये हुए औषधोंको बरते ॥ १४ ॥
वातको हरनेवाले विदाही तथा भारी ऐसे भोजन पथ्य कहे हैं ॥ १५ ॥
इति चेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने कर्णरोगचिकित्सानाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ४५.
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अथ नेत्ररोगकी चिकित्सा ।
आत्रेय उवाच॥ उष्णतिक्षारकटुकैरभिघातेन वा पुनः॥ सूक्ष्म-
वस्त्रेक्षणेनापि दोषाः कुप्यन्ति नेत्रजाः॥ १॥ सहजा य पराजेया
वक्ष्यामि शृणु लक्षणम्॥ रूक्षः कण्डूश्च तोदश्च शुष्कशीतास्रस-
न्ततिः ॥ २ ॥ वातिकं तं विजानीयात्पैत्तिकं शृण्वतः परम् ॥
॥३॥ सरक्ते सदाहे नेत्र उष्णस्रावश्च पैत्तिके ॥ शोफकण्डू सन्नि-
पाते शीतजाड्ये कफात्मके ॥४॥ द्वन्द्वजो मिश्रालिङ्गैश्च सर्वैस्तैः
सान्निपातिके ॥ एतद्धि लक्षणं ज्ञात्वा चोपचारं शृणुष्व मे ॥५॥