हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
वातसे उपजे इन्द्रलुप्त रोगमें गुड, तुलसी, सूंठ, बिजौराका रस, इनका लेप करना चाहिये
॥ ३ ॥ त्रिफला, वच, बहेडा, गुड़, इनको पीस कफसे उपजे इंद्रलुप्तको धोवना
श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ पित्तके इंद्रलुप्तमें दूध, नौनीघृत, मिसरी, आंवला, मुलहटीको पीस
धोना श्रेष्ठ है ॥ ५ ॥ भंगराका रस, अदरखका रस, कांजीका रस, इन्होंमें तिलोंको पीस लेप
कर पीछे गरम जलसे स्नान करे ॥ ६ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, शिरस, बहेडा, इनका काथ बना
धोनेसे शिरके दाद, इन्द्रलुप्त इनकी शांति होती है ॥ ७ ॥ रक्तकोरंटा, जासवंद, इनके पुष्पों-
को घिस लेप करनेसे इन्द्रलुप्तका नाश होता है॥८॥ पित्तसे उपजे इंद्रलुप्तमें दूधसे धोवना श्रेष्ठ
है और शीतल वस्तु देवे पित्तको करनेवाले इलाज नहीं करे ॥ ९ ॥ धतूराके पत्ते, पीपल,
हलदी, इंद्रायण, वरका धूवां, कूठ इनको जलमें पीस घृतमें मिला शिरपे लेप करनेसे इन्द्रलुप्तक
नाश होता है ॥ १० ॥ पित्त दोषसे उपजे इंद्रलुप्त रोगमें परवलके पत्ते, नींव, आँवलाका फल,
इनको पीस घृत और खांड मिला लेप करनेसे ॥ ११ ॥ मस्तकपै उपजा केशनाशरोग दूर
होता है और यह लेप शिरकी पीडाओके समूहोंका नाश करता है और हस्ती दांतको
फूकि उसकी स्याहीको नौनीघृतमें मिला लेप करनेसे ॥ १२ ॥ अथवा तिल, आक,
भिलावा, उड़द इनको दग्ध करि इनके खारको नौनीघृतमें मिला लेप करनेसे तथा विधिसे
निकासा हुआ सर्पके खारका लेप करनेसे गंजे शिरपे केशोंके समूह बढ़ जाते हैं ॥ १३ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्त० हारीतसंहिताभाषाटीकायां
इन्द्रलुप्तचिकित्सानाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ४४.
अथ कर्णरोगलक्षण ।
आत्रेय उवाच ॥ शेषेण वा तोयभृतेन वापि मलेन वा चाति
भवेद्रुजा च ॥ उच्छ्वासरोधाद्भवते तथापि वातादिकैर्वा कुपितै-
रथापि ॥ १ ॥ संसर्गदोषैरपि सर्वदोषैः क्रिमिव्रणेनापि तथैव
चान्या ॥ संजायते कर्णरुजा नरस्य शृणोति तेनापि बहुस्वनां-
श्च ॥२॥निःस्वानमेघध्वनिदन्तशब्दान् शूलं सदाहं च शिरो-
व्यथा च ॥ वेणुस्वनं वत्स शृणोति सर्वं पित्तेन तं विद्धि
भिषग्वरिष्ठ ॥ ३ ॥ तथा च मूर्च्छा प्रतनौति शब्दं मेघस्वनं
वा कफजे शृणोति ॥ ४ ॥ क्रिमिदोषे स्रवेत्पूयं सरक्तं वाति