हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] भाषाटीकासमेता । ( १३ )
तरो भवेत्॥१५॥तथा दोषस्य शेषे तु शमनं याति चाल्पशः॥
दैवाद्यदुष्टतां याति यथाग्निः कुपितो भृशम् ॥ १६ ॥
जब साध्य रोग हो तब वात आदि दोषके शेषको नहीं धारण करना क्योंकि दोषके
बाकी रहनेमें कष्ट हो जाता है इसलिये दोषका नाश कर दे ॥ १४॥ जैसे काल दुष्ट होता है
जैसे अग्निका सूक्ष्म किनका बढ़ जाता है तैसे क्रियाको नहीं प्राप्त हुआ स्वल्प भी रोग अतिघोर
हो जाता है ॥ १५ ॥ दोषके शेषमें अतिअल्परोग शांत हो जाता है परंतु दैवयोगसे यदि
फिर दूषित होजाता है तो दवे अग्नि ही के समान कुपित होता है ॥ १६ ॥
अपथ्यसे हानि ।
यथा काष्ठचय दूरात् प्राप्य घोरतरोऽग्निकः ॥ तथा पथ्यस्य
संयोगाद्भवद्धोरतरो गदः ॥ १७ ॥ कषायैश्च फलैश्चूर्णैः
पिण्डलेहानुवासनैः ॥ सर्वाः क्रिया भृशं व्यर्था न शमं याति
चामयः ॥ १८ ॥
जैसे काष्ठके समूहमें दूरसे प्राप्त हुआ अग्नि भयंकर होजाता है तैसे अपथ्यके संयोगसे
रोग भी अतिघोर हो जाता है ॥ १७ ॥ काढा, फल, चूरन, गोली, चटनी, अनुवासन
बस्तिकर्म इनकी सब क्रियायें व्यर्थ होजाती और रोग शांत नहीं होता है ॥ १८ ॥
एवं ज्ञात्वा सदा वैद्यै रोगशान्तिककारणम् ॥
कर्त्तव्यमतियोगेन येन रोगः प्रशाम्यति ॥ १९ ॥
ऐसा जानकर सब कालमें वैद्योंको रोगशांति करनेवाली क्रिया अतियोगसे अर्थात् पूर्वोक्त-
क्रिया विशेष करके करनी चाहिये जिससे रोग शांत हो जावे १९ ॥
लंघनकी योग्यता ।
ज्ञात्वा दोषबलं धीमल्लँघनानि समाचरेत् ॥
दोषे सति न दोषाय लंघनानि बहून्यपि ॥ २० ॥
वैद्य दोषके बलको समझकर लंघन कराये । क्योंकि दोष रहनेपर बहुत भी लंघन कोई
उपद्रव नहीं करते ॥ २० ॥
जठराग्निका कर्म ।
पचेत्प्रथममाहारं दोषानाहारसंक्षये ॥
दोषक्षयेऽनलो धातून्प्राणान्धातुक्षये सति ॥ २१ ॥