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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 548 में से

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पृष्ठ 444

( ४१२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
आश्रय रहती है ॥ १२ ॥ टांकनेकी गुल्फ अस्थि संधि इनमें विमेदिनी लूत होती है और
कोखो कानके समीपस्थान, नेत्रोंके समीप यह कांतारीनामक लूत होती है ॥ १३ ॥ वज्रपुष्पा
शिरमें होती है और नसोंके मध्यमें इंद्रायुधा लूत होती है हे पुत्र ! अब इनकी औषध कहते
हैं यत्नसे सुनो ॥ १४ ॥ कड़ीराध झिरती हो तहां गंभीर व्रण कहते हैं और अन्य पीडा स-
हित और पकेहुए जामनके फलके समान व्रण होता है ॥ १५ ॥ लूतके व्रण जबतक पके
नहीं उससे पहले मर्मसंधियोंको त्यागके लूतको और व्रणको गरम २ तैलसे दग्ध करना चाहि-
ये ॥ १६ ॥ अंकोल मदिरा, नींवके पत्ते, घरका धूम, कालाजीरा इनको गोमूत्रमें पीस लेप
करनेसे लूतका नाश होता है ॥ १७ ॥ तगर, वायविडंग, इंगुदीवृक्षकी जड़, बिजोराकी जड़
इनको पीस लेप करनेसे घोर गंडमाला कंटकरोग इनका शीघ्र ही नाश होता है ॥ १८ ॥ और
थोहरका दूध, आकका दूध, इनको लूतके छिद्रोंमें युक्त करनेसे उसके मध्यके कीडे मरजाते हैं,
॥ १९ ॥ सफेद गोकर्णी, चंदन, इनको समान भाग ले पीसके लेप करनेसे दारुण
लूतका नाश होता है ॥ २० ॥ कनेर, आकका दूध, कडुई तुंबी, दोनों हल्दी
कपूर, कचरी, इनको तिलोंके तैलमें पका ॥ २१ ॥ मालिस करनेसे लूत, गंडमाला, इनका
नाश होता है और जात्यादिक नामवाला घृत यहां युक्त करना श्रेष्ठ है ॥ २२ ॥ और अन्य
जो व्रणमें कहीहुई औषध हैं वे यहां करनी श्रेष्ठ हैं ॥ २३ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थानेलूतगंडमालाचिकित्सानानाम अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३९.
अथ कुष्ठचिकित्सा ।
आत्रेयउवाच॥ विरुद्धपानानि गुरूणि चाम्लपापोदक सेवन-
केन वापि ॥निद्रा दिवासुप्रतिजागराच्चपित्तं प्रकुप्येद्रुधिराश्रितं
तत् ॥ १॥ त्वचागतः सर्पति रोगदोषः कुष्ठेति संज्ञां प्रवदन्ति
धीराः ॥ पापोद्भवास्ते प्रभवन्ति देहे नृणां भृशं कोपयतां
विधिज्ञा ॥ २॥
आत्रेयजी कहते हैं-विरुद्धपान और गरिष्ठ भोजन, खट्टे तथा दूषित जलके सेवनेसे,
दिनमें सोने और रातमें जागरण करनेसे रक्तके आश्रय हुआ पित्त कुपित होता है ॥ १ ॥
त्वचामें प्राप्त हुआ रोगरूपदोष फैलता है,तब कुष्ठ ऐसी संज्ञा होती है । पापसे उत्पन्न होनेवाले
वे रोग मनुष्योंके शरीरमें कोपसे प्राप्त होजाते हैं अब तिनके जुदे जुदे लक्षणोंको कहेंगे ॥२॥