हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३४] भाषाटीकासमेता । (४०१)
धोना हित है और पांच प्रकारके जीरे, कैथ, इनको कांजीमें पीस बिजौराके रसके संग वातके विस-
र्पमें लेप करना हित है ॥१०॥ धव, लोध, तिल, एलवालुक, विदारीकंद, गोखरूको पीस लेप
करना अथवा चिरमठीके पत्तोंका लेप करना हित है ॥ ११ ॥ सैंधानमक, नींव, तुंबी,
परवलके पत्ते इनको घृतमें पका लेप करनेसे सब प्रकारके विसर्पोका नाश होता है ॥ १२ ॥
रक्तसे उपजे हुए विसर्परोगमें फस्तखुलानी चाहिये पीछे धव, कदंब, वरका धुवां ॥ १३ ॥
इनका लेप करना हित है और कांजीसे धोवना हित है और आजबला, तुलसी, पुआड़, दोनोँ
प्रकारकी हल्दी ॥ १४ ॥ सरसों इनको कांजीमें पीस लप करना हित है ॥ १५ ॥
इति वेरीनिवार्सिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटी-
कायां तृतीयस्थाने विसर्पचिकित्सानाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ३४.
अथोपसर्गचिकित्सा ।
आत्रेय उवाच ॥ चतुर्विधो भवेद्दोषो वातरक्तसमुद्भवः ॥
गन्धदोषेण जायन्ते नामान्येषां पृथक् पृथक् ॥१॥ क्षुद्रतश्चा-
न्तको घोरोऽथवा चान्यमसूरिका ॥ वसन्तः सर्षपाकारा पिटका
यस्य दृश्यते ॥ २ ॥ सोऽपि क्षुद्रतरः प्रोक्तः पित्तरक्तप्रदोषतः ॥
अग्निदग्धवत्स दाहः पिटिका यस्य दृश्यते ॥ ३ ॥ सोऽप्यतीव
विसर्पी स्यादसुखी च निरन्तरम् ॥ ४ ॥ सघनाः पीडका यस्य
पाक्यति समः कफः ॥ दाहोऽरतिर्विवर्णत्वं तस्य सद्यः प्रजायते
॥५॥ वर्त्तुलमसूरिकावत् पिटका यस्य दृश्यते ॥ शाम्यति शीघ्रं
पाकेन सा विज्ञेया मसूरिका॥तस्य वक्ष्यामि भेषज्यं यथाविधि
महामते ॥ ६ ॥
आत्रेयजी कहते हैं--वातरक्तसे उपजाहुआ चारप्रकारका दोष होता है सो गंधके दोषसे
उत्पन्न होते हैं उनके जुदे २ नामोंको कहते हैं ॥ १ ॥ क्षुद्रक, अंतक, घोर, मसूरिका ये
हैं और जिसके गौर सरसोंके आकार फुनसी दीखें ॥ २ ॥ वह क्षुद्ररोग, पित्तरक्तके दोषसे
होता है और जिसमें अग्निके दग्ध होनेके समान दाह हो ॥ ३ ॥ निरंतर सुखी नहीं हो वह
अति घोर विसर्परोग होता है ॥ ४ ॥ कड़ी तथा पकीहुईके समान पिड़िका हो, दाह हो,
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