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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 431

अ० ३३] भाषाटीकासमेता । (३९९)
सा चैवोन्नीतरोगिणे ॥१३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृती-
यस्थाने वृषणवृद्धिचिकित्सा नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
कफसे उपजे अण्डवृद्धिमें वच, नमक, कदंबवृक्ष, सरसों, इनका क्वाथ बना सेवन करना हित है
॥८॥ लाल ऊंगा, वायवरणा, कंकोल, शालपर्णी, शतावरी, इनका क्वाथ पित्त और सन्निपातसे
उपजे अंडवृद्धिरोगमें हित है ॥ ९ ॥ अमरवेल, वायवरणा, दशमूल, शतावरी, इनका क्वाथ
वातके अंडवृद्धिरोगमें पीना हित है ॥ १०॥ इस करके सुख हो जाता है पीछे अन्यकर्म करें। कानके
मध्यमें रहनेवाली रक्तको धारण करनेवाली नाड़ीको विंधावे ॥ ११ ॥ बाईंतर्फ अंडवृद्धि होवे
तो दाहिने कानकी नस विंधावे और दोनोंतर्फ अंडवृद्धि होवे तो दोनों कानोंकी नसोंको विंधावे
ऐसे करनेसे सुख उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥ यह दारुण क्रिया कही है जिसके ज्यादा अंडवृद्धि
हो रही हो उस रोगीके करनी चाहिये ॥ १३ ॥
इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने वृषणवृद्धिचिकित्सानाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३.
अथ विसर्परोगकी चिकित्सा ।
आत्रेय उवाच॥ लवणाम्लक्षारकटुकैरुष्णस्वेदातिदोषतः॥ रक्त-
पित्तं प्रकुप्येत स विसर्पी भिषग्वर ॥१॥ स सप्तधा परिज्ञेयः
पृथग्दोषैश्च द्वन्द्वजैः॥ केवलो रक्तजस्त्वन्यः सन्निपातेन सप्तमः
॥ २ ॥ तथापरे प्रवक्ष्यन्ते नामानि च पृथक्पृथक्॥ आग्नेयो
ग्रन्थिको घोरः कर्दमश्च तथापरः ॥३॥ आग्नेयो वातपित्तेन
ग्रन्थिकः पित्तश्लेष्मणा॥ कदमो वातश्लेष्मोत्थो घोरः स्यात्सा-
न्निपातिकः ॥४॥ रक्तंलसीकात्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः॥
विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्तधातवः ॥५॥ न्यग्रोधबि-
ल्वखदिरकषायो धावने हितः ॥ काञ्जिकाम्लैः पिच्छिलया
सौवीरकरसेन वा ॥६॥ मातुलुङ्गरसेनापि धावनं वातसर्पिषु ॥
क्षीरेण शीततोयेन धावनं पित्तसर्पिणि ॥ ७ ॥ श्लेष्मविसर्पिणे