हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३] भाषाटीकासमेता । ( ११ )
उपचारकरनेकी योग्यता ।
ज्ञात्वा रोगसमुत्पत्तिं रोगाणामप्युपक्रमम् ॥
ज्ञात्वा प्रतिक्रियां वैद्यः प्रतिकुर्य्याद्यथोचिताम् ॥ २ ॥
कुशल वैद्य रोगकी उत्पत्ति, रोगोंके पथ्य आदि और चिकित्साको जानके पश्चात् यथोचित
प्रतिकार करे ॥ २ ॥
देश-काल आदिका ज्ञान ।
देशं कालं वयो वह्निं सात्म्यप्रकृतिभेषजम् ॥
देहं सत्त्वं बलं व्याधेर्दृष्ट्वा कम समाचरेत् ॥ ३ ॥
देश, समय, अवस्था, जठराग्नि, सानुकूलता, प्रकृति, औषध, देह, सत्त्व, और रोगका बल देखके
पीछे चिकित्साका आरंभ करे ॥ ३ ॥
उपचारकरनेका फल ।
धर्मार्थकामलाभः स्यात् सम्यगातुरसेवनात् ॥
यदा नाचरतस्तस्य विनाशश्चात्मनस्तदा ॥ ४ ॥
रोगीकी अच्छी तरह चिकित्सा करनेसे धर्म, अर्थ, और कामकी प्राप्ति होती है । जो वैद्य
रोगीकी चिकित्सा नहीं करता उस वैद्यके शरीरका नाश हो जाता है ॥ ४ ॥
वैद्यका वैद्यत्व ।
व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं वेदनायाश्च निग्रहः ॥
एतद्वैद्यस्य वैद्यत्वं न वैद्यः प्रभुरायुषः ॥ ५ ॥
रोगके तत्त्वको जानना, पीड़ाका नाश करना, वैद्यका यही वैद्यपना है और आयुका मालिक
वैद्य नहीं है ॥ ५ ॥
दो प्रकारका उपचार-उपक्रम ।
द्विविधोपक्रमश्चैव शमनः कोपनो रुजाम् ॥
तथैव ज्ञात्वा विबुधः क्रियां कुर्य्याद्विचक्षणः ॥ ६ ॥
चिकित्सा २ प्रकारकी है, एक शमन दूसरी कोपन । सो रोगको जानके कुशल वैद्य क्रियाको
करे ॥ ६ ॥
दो प्रकारके वैद्य ।
वैद्योऽपि द्विविधो ज्ञेयो विकारेङ्गितरोगयोः ॥ उपचारापचारज्ञो
द्विविधः प्रोच्यते भिषक् ॥ ७ ॥ उपचारेण शमनमपचारेण
कोपनम् ॥ एवं विज्ञाय सवैद्यः कुर्य्यात् संशमनक्रियाम् ॥८॥