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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

( ३८२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-

लक्षणोँसे युक्त हो वह सन्निपातसे उपजा गुल्म जानना ॥ ६० ॥ व्यथा हो, ग्लानि हो,
विवर्ण हो, मूर्च्छा हो, अतीसार हो, वमन हो, गीलापन हो, आलस्य हो, वह त्रिदोषसे उपजा
गुल्मरोग असाध्य जानना ॥ ६१ ॥
अथ शोथचिकित्सा ।
शृणु पुत्र महाप्राज्ञ एकाग्रमनसाऽधुना ॥ शोफोद्धारक्रियां नृणां
वक्ष्यते च विजानता ॥ ६२ ॥ त्रिवृत्तथा चेक्षुगुडेन युक्ता अ-
नन्तरं कोष्णजलेन पीता॥तस्मान्निहन्त्योदरकं सशोफं पित्ता-
त्मकं वा विजहाति पुंसाम्॥६३॥हरीतकी च त्रिवृता च शुण्ठी
गुडेन युक्ता त्वथ हन्ति शोफम् ॥ द्विपञ्चमूलं कथितं सुखो-
ष्णमेरण्डतैलेन जहाति शोफम् ॥६४॥ गोमूत्रयुक्तं वरुणस्य
तैलं पाने हितं नाशयते च शोफम् ॥ ६५ ॥
हे पुत्र ! अब एकाग्र मन करके सुनो, मनुष्योंके शोजाको दूर करनेवाली क्रियाको कहते हैं
॥ ६२ ॥ निशोतको ईखके गुड़के संग खावे पीछे गरम जल पीवे इससे शोजासहित
उदररोगका नाश होता है और पित्तसे उपजा गुल्मरोग भी शांत होता है ॥ ६३ ॥
हरडै, निशोत, सोंठ इनको गुड़में मिला खानेसे शोजाका नाश होता है और दशमूलके
गरम २ क्वाथको अरंडीके तेलके संग पीनेसे शोजाका नाश होता है ॥ ६४ ॥ और
वरुणाका तैल गोमूत्रके संग पीना हित है तथा शोजाको नाशता है ॥ ६५ ॥
अथ शोथरोगमें वर्ज्य ।
ग्राम्यानूपं पिशितलवणं शुष्कशाकं नवान्नं गौडं पिष्टं सद्-
धिकृशरं निर्जलं मद्यमन्नम् ॥ धान्यं शोफाकरणमथवा गुर्व-
सात्म्यं विदाहि स्वप्नं रात्रावपि च श्वयथुर्वर्जयेन्मैथुनं च॥६६॥
लेपोऽरुष्करस्य शोफं हन्ति तिलदुग्धमधुकनवनीतैः॥तत्तरुत-
लमृद्भिर्वा सकदलैर्वापि सविरणैः ॥ ६७ ॥ शोषे विषनिमित्तं
तु विषोक्ता शमनक्रिया ॥ लंघनं दीपनं स्निग्धमुष्णवाता-
नुलालनम् ॥ ६८ ॥ बृंहणं तु भवेदन्नं तद्विषं सर्वगुल्मिनाम् ॥
वल्लूरं मूलकं मत्स्याञ्छुष्कशाकादि वैदलम् ॥६९॥ न
खादेद्वालुकं गुल्मी मधुराणि समानि च ॥ ७० ॥