हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 407, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३७५ )
गुल्म जानना ॥ २ ॥ शोष हो, पीडा हो, ग्लानि हो, पीला शरीर हो, मन्द ज्वरकी पीड़ा हो,
तम अर्थात् अँधेरी, भ्रम, पिपासा ये हों वह पित्तसे उपजा गुल्म जानना ॥ ३ ॥ शोष हो,
जडता हो, थुकथुकी हो, तंद्रा हो, आलस्य हो, ठंडकर रहे, मन्दाग्नि रहे, विष्ठा बन्ध रहे वह
कफसे उपजा गुल्म जानना ॥ ४ ॥ मोह, विभ्रम, जडता, ग्लानि, क्षुधा, पिपासा,
आलस्य, निद्रा आना ये हों वह कफपित्तसे उपजा गुल्म जानना ॥ ५ ॥ निद्रा हो,
आलस्य हो, दाह हो, शूलसहित शोजा हो, ज्वर हो, बुरा वर्ण हो, ग्लानि हो, जड़ता, मलबंध,
विकलपना ॥ ६ ॥ अतिसार, मूर्च्छा, तृषा, थुकथुकी, कांपना, श्वास, अरुचि, अजीर्ण,
ये हों वह सन्निपातका गुल्म जानना ॥ ७ ॥ एक दोषका गुल्म साध्य है और दो दोषोंसे
उपजा गुल्म कष्टसाध्य है, सन्निपातसे उपजा गुल्म असाध्य होता है । अब इनकी चिकित्सा
कहेंगे ॥ ८ ॥
अथ गुल्मचिकित्सा ।
यकृद्ग्रहणीचिकित्सैव कथितं चोपवारणम् ॥ तद्वत्प्लीहा समा-
ख्यातो न चात्र कथितः पुनः॥९॥ चिकित्सोदरगुल्मस्य वक्ष्यते
शृणु साम्प्रतम् ॥ स्नेहनं रूक्षणञ्चैव पाचनं शोधनानि च
॥१०॥संशमनं विरेकश्च बस्तिस्नेहनिरूक्षणम् ॥ क्षारपानञ्च
चूर्णानि गुल्मोपचरणक्रिया ॥ ११ ॥
पहले यकृत् ग्रहणीके गुल्मकी चिकित्सा जो कही है वही तिल्लीकी चिकित्सा जान लेनी,
अब फिर नहीं कहेंगे ॥ ९ ॥ अब गुल्मोदर अर्थात् पेटके गुल्मकी चिकित्साको कहते हैं सो
सुनो । स्नेहन, रूक्षण, पाचन, शोधन ॥ १० ॥ संशमन, जुलाब, स्नेहनवस्ति, रूक्षण-
वस्ति, क्षारपान, चूर्ण ये सब क्रिया गुल्मरोगकी शांतिके वास्ते करें ॥ ११ ॥
अथ शुंण्ठ्यादि क्वाथ ।
पञ्चमूलं लघुः शुण्ठी मूर्वा च सुरसा तथा ॥
क्वाथोऽस्याष्टावशेषः स्यात्तत्समं क्षीरमेव च ॥ १२ ॥
सोंठ, देवदार, तुलसी, मूर्वा, लघुपंचमूल इनका क्वाथ अष्टमांश बाकी जल रहे ऐसा
लेवे और इसके बराबर दूध मिलावे ॥ १२ ॥
अथ स्नेहविधि ।
दधि तत्सममाज्यं तु पाचयेत्तत्समाग्निना॥घृतं यावत्प्रदृश्येत
सिद्धमुच्चार्य्यते ततः॥ १३ ॥ तत्कृतं पानकेऽभ्यङ्गे भाजने च
प्रदापयेत् ॥ स्नेहः सप्तविधो यावत्तास्माच्च रूक्षणं हितम् ॥१४॥