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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

अ० २५ ] भाषाटीकासमेता । ( ३७१ )
नि च॥क्वाथपानं प्रयोक्तव्यमम्लपित्तं व्यपोहति ॥४॥ पटोल-
पाटलाक्वाथो धान्यनागरकान्वितः॥जलेन हितकः प्रोक्तश्चाम्ल-
पित्तनिवारणे ॥५॥पटोलविश्वामृतवल्लितिक्तापत्राणि निम्बस्य
च वत्सकानाम्॥क्वाथो विसर्पे कृतमम्लपित्तं विनाशयेन्मण्डल-
कानि दद्भून् ॥६॥ रात्रौ संपाचनं देयं धान्यनागरकल्कितम् ७
इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अम्लपित्तचिकित्सा
नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
उसके इलाजको सुनो । वहां शीघ्रही पहले वमन करवावे और जो अम्लपित्त नीचेको
प्राप्त हो रहा हो तो जुलाब दिवानी चाहिये ॥ ३ ॥ नींवके पत्ते आंवले इनका काथ बना पीनेसे
अम्लपित्तका नाश होता है ॥ ४ ॥ परवल, पाडलवृक्ष इनका काथ अथवा धनियां, सोंठ इनका
काथ बना पीनेसे अम्लपित्तका निवारण होता है ॥ ५ ॥ परवल, सोंठ, गिलोय, कुटकी और
नींव, वासा इनके पत्तोंका काथ बना पीनेसे विसर्परोगसे उपजा हुआ अम्लपित्तका नाश होता है
और मंडल, दद्रु इनका नाश होता है ॥ ६ ॥ और धनियां, सोंठ इनका कल्क बना रात्रिमें
पाचनके वास्ते देना चाहिये ॥ ७ ॥ इति बेरीनिवासि० हारीतसंहिताभाषाटीकायां अम्लपित्त-
चिकित्सानाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
पञ्चविंशोऽध्यायः २५.
—:•:—
अथ शोफचिकित्सा ।
आत्रेय उवाच॥शोफो भवेच्च विकलेन्द्रियरोममार्गे क्षीणे बले
वपुषि चाम्लकटूष्णसेव्यात् ॥ शैत्यात्तथा विशदपिच्छल-
सेवनेन रूक्षाभिघातपतनेन च धारणाद्वा ॥१॥आमाशये गत-
वतोऽपि नरस्य यस्य अन्ते प्रधावति ततोऽपि च दोष एषः ॥
पाणौ तथैव चरणे च पृथक् प्रसूतो द्वन्द्वेन वा भवति शोफ-
विकारचारः॥२॥ नरस्य चान्तःप्रभवाश्च शोफाः साध्या भवेयु-
र्विंनता मुखेषु॥साध्यैर्विना सर्वशरीरगाश्च पादे स्त्रियो वा वदने
नरस्य ॥ ३ ॥ वायौ क्षये वापि च गुल्मदेशे तद्राजयक्ष्मण्य-