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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 392

( ३६० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
शूल हो और गोलाकी तरह पेट बोले आंतोंमें शोजा हो ॥ १०४ ॥ शिर भारी हो और
बहुतसी आंव गिरै वह सर्वांगवात अर्थात् सब अंगमें प्राप्त हुआ वात जानना ॥ १०५ ॥
उसमें पहिले पाचन औषध देवे पीछे जुलाबकी औषध देवे और जिसका मलबंध हो गोला
पक जावे वह भी अन्यप्रकारका सर्वांगवात कहाता है ॥ १०६ ॥ वहां एक तो साध्य होता
है और दो कष्टसाध्य होते हैं, और स्नेह, तैलादिक देके वमन करके मृगीरोगको
दूर करे ॥ १०७ ॥
अथ नारायणनामक तैल ।
श्योनाकः पाटला बिल्वं तर्कारी पारिभद्रकम् ॥ अश्वगन्धा
कण्टकारी प्रसारिणी पुनर्नवा ॥ १०८ ॥ श्वदंष्ट्रातिबला चैव
बला च समभागिकी ॥ पादशेषं जलद्रोणे कथितं परिस्रावयेत्
॥ १०९॥वाच्यमानानि योज्यानि भेषजानि भिषग्वरैः॥११०॥
शतपुष्पा वचा मांसी दारु शैलेयकं वरा ॥ पतङ्गं चन्दनं कुष्ठं
तथान्यं रक्तचन्दनम् ॥ १११ ॥ करञ्जबीजांशुमती त्रिसुगन्धि
पुनर्नवा ॥ रास्ना तुरङ्गगन्धा च सैन्धवं च दुरालभा ॥ ११२ ॥
मिष्टासुरसा चैतच्च प्रत्येकं तु पलद्वयम् ॥ चूर्णं कृत्वा क्षिपेत्तत्र
क्षिपेल्लाक्षारसाढकम् ॥ ११३ ॥ शतावरीरसं चैव अजाक्षीरं
चतुर्गुणम् ॥ दधि तत्राढकं गव्यं तिलतैलं प्रयोजयेत् ॥११४॥
सिद्धंतत्र प्रहृश्येत ततो मङ्गलवाचनम्॥ प्रति ह्येनं प्रति ष्ठाप्य
नारायणमिदं स्मृतम् ॥११५॥ हन्ति वातविकारांश्च अपस्मार-
ग्रहांस्तथा ॥ शिरोरोगान्कर्णरोगान्कुष्ठान्यष्टादशान्यपि
॥११६॥वन्ध्या च लभते पुत्रं षण्ढोऽपि पुरुषायते ॥कृशो युवा-
यते मूर्खो विद्याराधनतत्परः ॥ ११७ ॥ नारायणमिदं तैलं
कृष्णात्रेयेण भाषितम् ॥ ११८ ॥
सोनापाठा, पाडलवृक्ष, बेलपत्र, अरणी, नींव, असगंध, कटेहली, खींप, सांठी ॥ १०८॥
गोखरू, खरैहटी, गंगेरनकी जड़ इनको समान भाग ले १०२४ ॥ तोले जलमें पकावे जब
चतुर्थांश बाकी रहे तब उतारि वस्त्रसे छान लेवे ॥ १०९ ॥ पीछे वैद्यजनोंको आगे कही हुई
औषधें गेरनी चाहिये ॥ ११० ॥ जैसे-सौंफ, वच, जटामांसी, देवदार, शिलारस, त्रिफला,