हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । (७)
द्वितीयोऽध्यायः २.
चिकित्सासंग्रह ।
आत्रेय उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि शास्त्रस्यास्य समुच्चयम् ॥
आयुर्वेदसमुत्पत्तिं सर्वशास्त्रार्थसंग्रहम् ॥ १ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-इस पहिले अध्यायको कहकर अब दूसरे अध्यायमें इस शास्त्रके
समुच्चय आयुर्वेदकी समुत्पत्ति और सब शास्त्रोंके अर्थके संग्रहको कहूंगा ॥ १ ॥
अष्टौ चात्र चिकित्साश्च तिष्ठन्ति भिषजां वर ॥
ता वक्ष्यामि समासेन चिकित्साश्च पृथक्पृथक् ॥ २ ॥
हे वैद्योंमें श्रेष्ठ ! इस ग्रन्थमें आठ प्रकारकी चिकित्सायें स्थित हैं, सम्पूर्णतासे उन्हें और
भांति भांतिकी चिकित्सायें कहूँगा ॥ २ ॥
संग्रहस्य प्रवक्ष्यामि प्रथमं चान्नपानकम् ॥ अरिष्टं च द्वितीयं
स्यात्तृतीय च चिकित्सितम् ॥३॥ कल्पं चतुर्थकं प्रोक्तं सूत्र-
स्थानन्तु पञ्चमम् ॥ षष्ठं चात्र शरीरं स्यादित्यायुर्वेदकारकाः
॥४॥ शल्यशालाक्यकायाश्च तथा बालचिकित्सितम् ॥ अगदं
विषतन्त्रञ्च भूतविद्या रसायनम् ॥ वाजीकरणमेवेति चिकित्सा
चाष्टधा स्मृता ॥५॥ वैद्यागमेषु सर्वेषु प्रोक्तं श्रेष्ठमिदं महत् ॥
तथा चाष्टौ चिकित्सायां वदन्ति वेदविज्जनाः ॥ ६ ॥
संग्रहके अन्नपानामक प्रथमस्थान, अरिष्ट नामवाले दूसरे स्थान और चिकित्सित नामवाले
तीसरे स्थानको कहूंगा ॥ ३॥ कल्प नामवाला चौथा स्थान है, सूत्रस्थान पाँचवाँ है, शारीर-
स्थान छठा है ऐसा आयुर्वेदको करनेवाले कहते हैं ॥ ४ ॥ शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा,
बालचिकित्सित, अगद, विषतंत्र, भूतविद्या, रसायन, वाजीकरण इसतरह चिकित्सा आठ प्रकारसे
कही है॥५॥ वैद्योंके सब ग्रन्थोंमें यह उत्तम और बड़ा ग्रन्थ माना है तथा आयुर्वेदज्ञोंने चिकित्सा में
यह आठ प्रकारकी चिकित्सा श्रेष्ठ कही है ॥ ६ ॥
यन्त्रशस्त्राग्निक्षाराणामौषधं पथ्यमेव च ॥
स्वेदनं मर्दनं चैव कथितान्युपकारिणाम् ॥ ७ ॥
यंत्रकर्म, शस्त्रकर्म, अग्निकर्म, क्षारकर्म, औषध, पथ्य, स्वेदन और मर्दन यह आठ श्रेष्ठ
चिकित्सायें उपकार करनेवाली चिकित्साओंमें श्रेष्ठ कही गयी है ॥ ७ ॥