हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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तत्रैव मिश्रयेत् ॥ ८२ ॥ सिद्धं सर्वगुणं श्रेष्ठं कृत्वा मङ्गलवाच-
नम् ॥ सौवर्णे राजते कुम्भे वाथवा मृन्मयायसे ॥८३॥ प्रतप्तं
धारयित्वा तु पानाभ्यङ्गे निरूहके ॥ बस्तौ वापि प्रयोक्तव्यं
मनुष्यस्य यथाबलम् ॥८४॥ वातार्दितेऽथवा भग्ने भिन्ने वापि
प्रदापयेत् ॥ या वन्ध्या च भवेन्नारी पुरुषाश्चाल्परेतसः॥८५॥
क्षीणो वा दुर्बलो वापि तथा जीर्णज्वरातुरः ॥ आमवातातुरो-
णाञ्च तथा प्रक्षिप्य कञ्चटम् ॥८६॥ प्रभाते च प्रयोक्तव्यं तथा
शुष्के हनुग्रहे॥ कर्णशूले चाक्षिशूले मन्यास्तम्भे च पार्श्वगे ॥
॥८७॥ सर्ववातविकाराणां हितं तैलं यथामृतम् ॥ हन्ति श्वासं
च कासं च गुल्मार्शोग्रहणीगदम् ॥८८॥ अष्टादशानि कुष्ठानि
शीघ्रं वापि नियच्छति ॥ ग्रहभूतपिशाचाश्च डाकिनी
शाकिनी तथा ॥ ८९ ॥ दूरदेशे पलायन्ते बलातैलस्य दर्श-
नात् ॥ अपस्मारादिदोषांश्च तच्च दूरे नियच्छति ॥९० ॥ वृद्धा
युवानो भवन्ति वन्ध्या च लभते सुतम् ॥ तैलं महाबलाद्यं च
महावातहरं स्मृतम् ॥ ९१ ॥
खरैहटीकी जड़ आठ भाग, दशमूल चार भाग इनको चारगुना जलमें और १०२४
तोले जलमें पकाके काथ बनावे ॥ ७७ ॥ पीछे उसमें २५६ तोले दूध मिला और २५६
तोले दही, २५६ तोले कुलथीके यूषको बासी करके मिलावे ॥ ७८ ॥ और तिलोंका
तैल १०२४ तोले ऐसे इन सबोंको मिला पीछे शनैःशनैः कड़ाहीमें पकावे और जीवंती, हरडै,
काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक ॥ ७९ ॥ मेदा, महामेदा, सरस, देवदार, शल्लकी,
लाल चन्दन, रोहिस तृण, शलका वृक्ष, मंजीठ, त्रिसुगन्धि अर्थात् तेजपात, इलायची,दालचीनी
॥ ८० ॥ जटामांसी, शिलारस, कूठ, वच, नील, अनंतमूल, शतावरी, असगंध, सौंफ,
सांठी ॥८१॥मदिरासे बाकी रहा द्रव्य, मदिरा, नागरमोथा, तालीसपत्र, कुटकी, नेत्रवाल
इन सबोंको एक जगह मिला ॥८२॥ पीछे इसको सिद्ध करे । यह सब गुणोंवाला है, श्रेष्ठ है ।
इसको मंगलाचरण करके सुवर्ण अथवा चांदी तथा मृत्तिकाके पात्रमें घाल धरे ॥ ८३ ॥
इसको गरम २ पीनेमें अथवा मालिसमें तथा निरूहवस्तिमें प्रयुक्त करे अथवा मनुष्यके
अग्निबलको विचार साधारण बस्तिमें इसको प्रयुक्त करे ॥८४ ॥ लकुवावात, भग्नवात, भिन्नवात
इन्होंमें यह औषध बरतना चाहिये और जो वन्ध्या स्त्री है अथवा अल्पवीर्यवाला पुरुष है