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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 548 में से

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पृष्ठ 364

( ३३२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अथ कफजमूर्च्छा ।
धूमाकुलां दिशं पश्येत्तमः पश्यति यः पुरः ॥ नेत्राकुलत्वं
मन्दाग्निस्तमोऽङ्गेषु च शीतता ॥ ११ ॥ चिरात्प्रबुध्यते-
ऽत्यर्थं कण्ठश्च घुर्घूरायते ॥ हल्लासमूर्च्छा भवति कफजा च
विलक्षणैः ॥ १२ ॥
धूमासे व्याप्त हुई दिशाको देखे और आगे अंधेरीको देखे, नेत्र व्याकुल होवें,मदाग्नि हो,
अंगोंमें भी मन्दपना और शीतलपना हो ॥ ११ ॥ बहुत देरमें जागे, कंठमें घुर्घुर शब्द होवे,
थुकथुकी होवे तब कफकी मूर्च्छा जाननी ॥ १२ ॥
अथ सन्निपातजमूर्च्छा ।
सन्निपातादपस्मारो दृश्यते भिषजांवर ॥
स प्राणिनां घातयति रक्तेन सहितो यदि ॥ १३ ॥
हे वैद्यवर ! सन्निपातसे मृगी रोग दीखता है वह रक्तसे मिलके जीवोंको नाशता है॥१३॥
अथ रक्तगन्धजमूर्च्छा ।
रक्तगन्धेन मूर्च्छन्ति तेन मूर्च्छा शिरोव्यथा ॥
कम्पते नष्टचेष्टत्वं जलपते वमते पुनः ॥ १४ ॥
रक्तकी गन्धसे उपजी मूर्च्छामें शिरपीड़ा होती है, रोगी कांपता है, चेष्टा नष्ट हो जाती
है, ज्यादे बोलता है और वमन करता है ॥ १४ ॥
अथ मद्यादिजन्यमूर्च्छा ।
विभ्रान्तचेता रक्ताक्षः स्वप्नशीलः सुरावशः ॥१५॥ क्षतक्षया-
द्ववेच्चान्या कोद्रवान्ननिषेवणात् ॥ जायते मोहमूर्च्छा च तेन
निद्राति दुर्मनाः ॥ १६ ॥
मदिरासे उपजी मूर्च्छामें भ्रमते हुए चित्तवाला और लाल नेत्रोंवाला और शयन करनेको
चाहनेवाला ऐसा मनुष्य होजाताहै ॥ १५ ॥ क्षतक्षयसे और कोदूआदि अन्नसे उपजी मूर्छामें
अत्यंत नींद आती है और मन बिगड़ जाता ॥ १६ ॥
मूर्च्छा, भ्रम, निद्रा और तंद्रा इन्होंका हेतु ।
पित्तोत्तमाद्भवति वै मनुजस्य मूर्च्छा पित्तप्रभञ्जनभवं भ्रममेव
पुंसाम् ॥वातात्कफात्तमयुता मनुजस्य तन्द्रा निद्रा कफानि-
लतमा भजते नरस्य ॥ १७ ॥