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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 548 में से

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पृष्ठ 362

( ३३० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
तेनास्य शोषं हरति तृष्णामपि नियच्छति ॥३४॥ रक्तशाल्यो-
दनं शस्तं दधिशर्करयान्वितम्॥भोजनञ्च प्रशस्तं च न क्षारं
कटुकं पुनः॥३५॥शोषे च च्छर्दितृष्णायां श्रमे पानात्ययेऽपि
च॥अतीसारे च शोषे च दिवा निद्रा सुखावहा ॥३६॥ इत्या-
त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने तृष्णालुशोषचिकित्सा
नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
विजौराकी केशरको चावलोंके पानीसे पीस पीनेसे तालुशोष और ज्वरसहित तृषा शांत
होती है ॥ ३० ॥ गरम किये शहदसे तालुपर लेप करे यह मुखशोषको नाशता है, शहद और
खांडसे तालुपर लेप करे यह मुखके शोषको दूर करता है ॥ ३१ ॥ कमल कंदको शीतल
पानीसे पीस लेप करे अथवा जामन और आंबके पत्तोंको पीस लेप करे तब तालुशोष
शांत होता है ॥ ३२ ॥ नींबू, विजौरा, कांजी, सूंठ, इनको इस रोगवालेके आगे खावे
परंतु उस रोगीको नहीं देना ॥ ३३ ॥ इनके देखनेसे रोगीके मुखमें अत्यंत लाल झिरने
लगती है उससे तृषा और शोष दूर होता है ॥ ३४ ॥ दही और खांडसे संयुक्त किये लाल
शालिचावल इसरोगमें भोजन करने श्रेष्ठ हैं, खारा और चरचरेको फिर नहीं खावे ॥ ३५ ॥
शोष, छर्दि, तृषा, परिश्रम, पानात्यय इन रोगोंमें दिनकी नींद सुखको देती है ॥ ३६ ॥
इति वेरिनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने तृषातालुशोषचिकित्सानाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
चतुर्दशोऽध्यायः १४.
अथ मूर्च्छाकी संप्राप्ति ।
आत्रेय उवाच॥वेगाभिघातातिनिरोधकेन क्षीणक्षताच्च तृषि-
तेन वापि॥विरुद्धयुक्तान्नविभक्षणेन दोषःप्रदुष्टःप्रकरोति मूर्च्छा
म्॥१॥ पञ्चेन्द्रियाणां संलग्नाः प्रत्येके द्वादशादयः ॥ पञ्चे-
न्द्रियाणां सहिता नाडिकाः षष्टिसंख्यया॥२॥रुन्धंति नाडि-
काद्वारं तेन चेतो विमूर्च्छति॥संज्ञानाशाद्भवेच्छीघ्रं निश्चेताश्च
सदा नरः॥३॥पतति काष्ठवत्तूर्णं मोहोन्मूर्च्छा निगद्यते ॥ सा
षड्विधा समुद्दिष्टा वातपित्तकफात्तथा॥४॥ शोणितादभिघा-