हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
द्राक्षोत्पलं सयष्टीकं शस्तं चेक्षुरससेवनात् ॥ पीतं पित्तोद्भवां
तृष्णां हन्ति दाहञ्च पित्तजम् ॥ १८ ॥ आकण्ठं शर्करायुक्तं
तथा क्षीरं पिबेन्नरः॥ वमनञ्चतदा कुर्याद्धन्ति तृष्णां सपैत्ति-
कीम् ॥ १९ ॥ लोष्टप्रतप्ततोयञ्च निर्वाप्य शीतलं कृतम् ॥
पिबेत्तृष्णाविनाशाय जलं वा चन्दनान्वितम् ॥ २० ॥
कंभारी, कमल, खस, दाख, मुलहटी, चंदन, नेत्रवाला इनके क्वाथमें खांड़ मिला पीवे यह पित्तकी
तृषाको हरता है ॥ १५ ॥ वडके कोंपल, लोध, मिश्री, चंदन, अनारदाना इनको चावलोंके
पानीसे अथवा शीतल पानीसे पीस पीवे । यह पित्तकी तृषाको हरता है ॥१६॥ कूठ,नीला-
कमल, धानकी खील, वडकी कोंपल इनके चूर्णमें खांड मिला गोली बांधै । ये गोली पित्तकी
तृषाको हरती है ॥ १७.॥ दाख, नीलाकमल, इनका और मौरेठीका चूर्ण अथवा ईखका रस
सेवनेसे पित्तकी तृषा और पित्तका दाह शांत होता है ॥ १८ ॥ खांडसे युक्त किये दूधको
कंठतक पीवे पीछे वमन करे तब पित्तकी तृषा शांत होती है ॥ १९ ॥ जलीहुई माटीको या
राखको, लोहको या वाळूरेतको गरम कर पानीमें बुझावे पीछे शीतल कर पीवे अथवा चंदनसे
युक्त किये पानीको पीवे तब पित्तकी तृषा शांत होती है ॥ २० ॥
अथ कफकी तृषाकी चिकित्सा ।
जम्ब्वाम्रकप्रवालानि तथा लाजा च चन्दनम् ॥ धातकीकुसु-
मानि स्युः पिष्ट्वासारसंयुतः ॥२१॥ ॥ श्लेष्मतृष्णापहो लेहो
दाहमूर्च्छाभ्रमापहः ॥ पिबेच्चाढकीयूषञ्च लाजाशर्करयान्वितम्
॥२२॥ क्षीरपानं समरिचं जलं वा मरिचान्वितम् ॥ श्लेष्म-
तृष्णाविनाशाय पिबेद्वा कोलकं पयः ॥ २३ ॥
जामुन और आंबकी कोंपल, धानकी खील, चंदन, धवके फूल इनको वांसाके रसमें
पीस चाटे । यह अवलेह कफकी तृषा, दाह, मूर्च्छा, भ्रम इनको नाशता है ॥ २१ ॥
धानकी खीलोंसे संयुक्त किये अरहरके यूषमें खांड़ मिला पीवे अथवा मिरचोंसहित दूधको पीवे
॥ २२ ॥ अथवा मिरचोंसहित पानीको पीवे अथवा वड़वेरीके पत्तोंके रसको पीवे तब कफकी
तृषा नष्ट होजाती है ॥ २३ ॥
अथ त्रिदोषकी तृषाकी चिकित्सा ।
दुरालभा पर्पटकं प्रियङ्गु लोध्रद्रुमं त्र्यूषणकं सकुष्ठम् ॥ क्वाथः
सुशीतो मधुशर्करायास्तृष्णां त्रिदोषप्रभवां निहन्ति ॥ २४ ॥