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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३२१ )
अथ बृहत्तालीसाद्य औषध ।
तालीसं त्रिफलाप्रियङ्गुमगधामूलञ्च मुस्ता शटी दाव्यैलादल-
नागकेसरलवङ्गानां तथा नागराः ॥ कृष्णाकोलकबालकं सच-
विला मूर्वा विषा कर्कटं द्राक्षा कुष्ठनिशाम्विवत्सकवृषं गोकण्ट-
तिक्ता तथा ॥ ४३ ॥ वृक्षाम्लं च सदाडिमाम्लकरसं पक्कं बद-
र्याः फलं चैतेषां समभागचूर्णविहितं योज्या समा शर्करा ॥
योज्यं चार्द्धपलं निहन्ति क्षतजं कासं तथा श्वासकं पाण्डुं
कामलमेदशोषगुदजे शस्तं सदा यक्ष्मिणाम् ॥ ४४ ॥
तालीसपत्र, त्रिफला, गोंदी, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, देवदार, इलायची, तेजपात,
नागकेशर, लौंग, सोंठ, पीपली, कंकोल, नेत्रवाला, चव्य, मूर्वा, अतीश,
काकड़ासिंगी, दाख, कूठ, दारुहलदी, चीता, कूड़ाकी छाल, बांसा, गोखरू, कुटकी ॥
॥ ४३ ॥ बिजौरा, अनारदाना, पके हुए बेर इनको समान भाग ले चूर्ण बनावे
और सब चूर्णके समान खांड मिलावे, इस चूर्णको आधा तोला प्रमाण खावे । यह क्षतसे
उपजी खांसी, श्वास, पांडुरोग, कामला, मेद, शोष, गुदाके रोग, राजयक्ष्मा इन
रोगोंको नाशता है ॥ ४४ ॥
मधुयष्टिका हिता प्रोक्ता क्षये कासे त्रिदोषजे ॥
क्षयसे उपजी हुई खांसीमें और त्रिदोषसे उपजी हुई खांसीमें मुलहटीका सेवन
करना हित है ॥
आमजे शूलरोगार्त्तिः पर्वभेदो भ्रमः क्लमः ॥
शोषः शिरोव्यथा क्लेदो नेत्रे गम्भीरमिच्छति ॥ ४५ ॥
आमसे उपजी हुई खांसीमें शूलरोगकी पीडा, संधियोंका भेद, भ्रम, ग्लानि ये होते हैं और
शोष हो, शिरमें पीडा हो, ग्लानि हो, नेत्र गंभीर हों ये लक्षण हो जाते हैं ॥ ४५ ॥
अथ छर्दिलक्षण ।
खल्ली वा चेतनं वापि अजीर्णाज्जायते वमिः॥सापि स्निग्धा च
रूक्षा च द्विविधा जायते वमिः॥४६॥ गम्भीरनेत्रो वमते विड्-
बन्धो वाति सार्य्यते ॥ गात्रे खल्लीकरं शूलं तथा शोथाति-
मूर्च्छना ॥४७॥ विकलाङ्गो भ्रमार्त्तश्च भ्रमन्तं पश्यते जगत् ॥
शिरोऽर्त्तिर्वेपतेऽत्यर्थं करपादौ हिमोपमौ ॥४८॥ एतैर्लिङ्गैस्तु
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