हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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रोग इनको नाशता है और कांतिको करनेवाला है सौभाग्यप्रद है और तेज, पुष्टि,
बल इनको बढ़ाता है ॥ ७६ ॥
अथ रक्तातिसारचिकित्सा ।
रक्तातिसारे च प्रयोजनीयं रक्तप्रवाहे सरुजे सदाहे॥फलत्रिकं
चातिविषा समङ्गा सपर्पटं दाडिमघातकीनाम्॥७७॥ क्षौद्रेण
मध्वा सहितं च चूर्णं तथैव दध्ना सघृतं सलेहम् ॥ रक्तातिसारं
रुधिरप्रवाहं योनिप्रवाहं सततं स्त्रियश्च॥७८॥ निवारयत्याशु
हितं नराणां बालातिसारे प्रशमाय योग्यम् ॥७९॥
रक्तातिसार तथा पीडासहित और दाहसहित रक्तप्रवाह, इन रोगोंमें त्रिफला, अतीस,
मंजीठ, पित्तपापड़ा, अनारदाना, धवके फूल ॥ ७७ ॥ इनका चूर्ण बना उसमें खांड
और शहद मिला और दही, घृत ये मिला फिर अवलेह बनाके देना चाहिये । यह अवलेह
रक्तातिसार, रुधिरप्रवाह, स्त्रीके निरंतर योनिका प्रवाह ॥ ७८ ॥ इनका निवारण करता है
और मनुष्योंको हित है । बालकके अतिसारको शांत करता है ॥ ७९ ॥
अथ योनिप्रवाहाचिकित्सा ।
योनिप्रवाहे मधुकं समङ्गा एलादलं निम्बदलानि पथ्या ॥
मुस्ता विशाला कटुरोहिणी च कल्को हितः शर्करया युतोऽयम्
॥८०॥ योनिप्रवाहं विनिवारयेच्च सयोनिशूलं सरुजां तृषा-
र्त्तिम् ॥ एला समङ्गा सहशाल्मलीभिर्हरीतकी मागधिका
समांशा ॥ ८१ ॥ क्वाथोदितः शर्करया समध्वा योनिप्रवाहं
विनिवारयेच्च ॥ ८२ ॥
योनिके प्रवाहमें मुलहठी, मंजीठ, इलायचीके पत्ते, नींबके पत्ते, हरडै, नागरमोथा, इंद्रायण,
कुटकी इन औषधोंका कल्क बना उसमें खांड मिला खाना चाहिये ॥ ८० ॥ यह विशेष
करके योनिके प्रवाहको दूर करता है और पीडासहित योनिशूल, तृषाकी पीडा इनको दूर
करता है और इलायची, मंजीठ, सेमर, हरडै, पीपली इनको समान भाग ले ॥ ८१ ॥
क्वाथ बना उसमें खांड और शहद मिला पीनेसे रक्तप्रवाह दूर होता है ॥ ८२ ॥
घर्मातपान्ते च विदाहि चाम्लं सौवीरकं वा कटुकं कषायम्॥
क्षारं सुरां वा परिवर्जनीयं सरक्तपित्ते मनुजे हिताय ॥ ८३ ॥
वास्तूकचिल्ली सुनिषण्णकञ्च जीवन्तिका वा शतपुष्पिका वा॥