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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 548 में से

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पृष्ठ 318

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
( २८६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अथ रक्तपित्तकी चिकित्सा ।
क्षीणमांसं कृशं वृद्धं बालं वा ज्वरपीडितम् ॥
शोषमूर्च्छाभ्रमापन्नं नातिरेचनमाचरेत् ॥ २१ ॥
क्षीणमांसवाला, कृश, वृद्ध, बालक, ज्वरसे पीड़ित, शोष, मूर्च्छा, भ्रम इनसे पीड़ित पुरुषको
जुलाव अधिक नहीं दिलावे ॥ २१ ॥
अथ ऊर्ध्वरक्तका उपाय ।
निष्पीड्य वासारसमाददीत क्षौद्रेण खण्डेन युतं च पानम् ॥
नासास्यकर्णे नयनप्रवृत्तं रक्तं तु शीघ्रं शमतां प्रयाति ॥२२॥
अथवा अडूसेके पत्तोंके रसको निचोड़ उसमें शहद और खांड मिला पीना चाहिये । इससे
नासिका, मुख, कान इनमें प्रवृत्त हुआ रक्त शीघ्रही शांत होजाता है ॥ २२ ॥
अथ वासादि क्वाथ ।
वासाकषायोत्पलमृत्प्रियङ्गुलोध्राञ्जनाम्भोरुहकेसराणि ॥ पीत्वा
समध्वा समिता प्रयोज्या पित्ताश्रयं चैवमुदीर्णमाशु ॥२३॥
वांसाका क्वाथ, कमलकी जड़की माटी, गोंदी, लोध, रसांजन, कमलकेशर, इनमें शहद और
मिसरी मिला पीनेसे रक्तपित्त शांत होता है ॥ २३ ॥
अथ निंबक्वाथ अथवा अडूसाका क्वाथ ।
प्रविद्यमाने पिचुवासकेऽस्मिन् कथं नरः सीदति रक्तपित्ते ॥
क्षये च कासे श्वसनेऽपि यक्ष्म वैद्याः कथं नातुरमादरन्ति २४
नींव और अडूसाके रहते मनुष्य क्यों रक्तपित्तसे दुःखित होता है । क्षय, कास, श्वास और
यक्ष्मामें वैद्य रोगीको क्यों यही नहीं देते हैं ? ॥ २४ ॥
अथ वासाकी प्रशंसा ।
भिषग्भिषजां माता वा पुरा कृत्य क्रिया यदि ॥ क्रियायते
रक्तपित्ते क्षये कासे च सिद्धिदा ॥ २५ ॥ वासायां विद्यमा-
नायामाशायां जीवितस्य च। रक्तपित्ती क्षयी कासी किमर्थम-
वसीदति ॥ २६ ॥
जो यह पहले कहीहुई चिकित्सा है यह सब वैद्योंकी माता है । रक्तपित्तमें, क्षयीरोगमें, खांसीमें
यह चिकित्सा सिद्धिको देनेवाली है ॥२५॥ जबतक वासा औषध है तबतक इस रोगवाले
की जीनेकी आशा है सो रक्तपित्तरोगवाला और क्षयरोगवाला तथा खांसीवाला पुरुष
किसवास्ते दुःख पाता है ॥ २६ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu