हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२८४) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने-
हारीत कहते हैं-पित्त कैसे कुपित होता है और किस प्रकार चलायमान होता है और
रक्तका कोप किस कारणसे होता है ? ॥४॥ एक बार दोनों मिले किस हेतुसे दीखते हैं और
कैसे प्रवृत्त होते हैं ? ऐसे पूछे हुए महाचार्य उत्तम मुनि कहते भये ॥ ५ ॥
आत्रेय उवाच ॥ शृणु प्राज्ञ महातेजश्चिकित्सागमपारग ॥
येनैव कुप्यते पित्तं रक्तं तेनैव कुप्यते ॥ ६ ॥ तावत्प्रकुपिते
कोष्ठे वायुर्दारयते भृशम् ॥ ऊर्ध्वं च नयते प्राणश्चापानोऽपान-
मीरति ॥ ७ ॥ मध्ये समानः कुरुते रक्तपित्तस्य कोपनम् ॥
एवं युगपत्पित्तञ्च रक्तेन सह कुप्यति ॥ ८ ॥ चतुर्द्धा दृश्यते
कोपो गतिश्चास्य द्विधा मता ॥ ऊर्ध्वश्लेष्मणि संसृष्टं नासास्ये
कर्णरन्ध्रयोः ॥ ९ ॥ रक्तं प्रवृत्तत यस्य साध्यास्तु विजिगी-
षुणा ॥ अधोयातेन संसृष्टं गुदेनापि प्रवर्त्तते ॥ १० ॥ स ज्ञेयो
रक्तपित्तस्तु कृच्छ्रेण सिद्धिमिच्छति ॥ उभाभ्यामथऊर्ध्वाभ्यां
वातश्लेष्मणि वर्त्तते ॥ ११ ॥ तमसाध्यं विजानीयात्कृच्छ्रेण
यदि सिध्यति ॥१२॥ एकमार्गबलतो वा नाभिवेगेन चोत्थि-
तः ॥ रक्तपित्तः सुखेनापि साध्यः स्यान्निरुपद्रवः ॥ १३ ॥
एकदोषानुगः साध्यो द्विदोषो याप्य उच्यते ॥ असाध्यस्तु
त्रिदोषेषु रक्तपित्तः प्रवर्त्तते ॥ १४ ॥ ऊर्ध्वगरक्तपित्तेषु विरेक
कारयेत्सुधीः ॥ अधोभागगत रक्ते तदास्य वमनं हितम् ॥ १५॥
आत्रेयजी कहते हैं-हे प्राज्ञ ! महातेजवाले ! वैद्यकशास्त्रके पारको जाननेवाले ! सुनो
जिस कारणसे पित्त कुपित होता है उसी कारणसे रक्तपित्त कुपित होता है ॥ ६ ॥ पहले
कोष्ठस्थानमें पित्त कुपित होके वायुको अत्यंत फाड देता है,प्राणवायु ऊपरको प्राप्त हो जाता है
और अपानवायु गुदाके स्थानमें कुपित हो जाता है ॥७॥ मध्यनाभिमें स्थित हुआ समान वायु
रक्तपित्तको कोप कर देता है इसी तरह एकही बार पित्त रक्तके संग कुपित हो जाता है
॥ ८ ॥ रक्तपित्तका कोप चार प्रकारसे दीखता है और इसकी गति दो प्रकारकी कही हैं
जिसके कफ मुखके ऊर्ध्वभागमें प्राप्त हो और नासिकाके तथा कानोंके छिद्रोंमें ॥ ९ ॥
रक्त प्रवृत्त होजावे वह साध्य कहा है और जिसके अधोमार्गमें रक्तकोप हो जाता है उसके गुदाके
द्वारा रक्त निकसता है ॥ १० ॥ वह रक्तपित्त कष्टसाध्य कहा है और जो ऊर्ध्वमार्गमें
प्राप्त हो तथा अधोमार्गमें प्राप्त हो और वात कफ अधिक वर्तते हों ॥ ११ ॥ वह