हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 313, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ९] भाषाटीकासमेता । ( २८१ )
स्याद्राजयक्ष्मातिदारुणः ॥ त्रिभिर्मासैश्च षण्मासैर्वर्षैश्चापि
त्रिभिः पुनः ॥ ११८ ॥
राजयक्ष्मारोगवाला पुरुष चारमहीनोंतक जीता है और बल अधिक होवे तो छःमहीनों-
तक जीता है और अत्यंत इलाज होते रहें तो हजारदिनोंतक जीता है ॥ ११५ ॥ राज-
यक्ष्मारोगवाले पुरुषका जीना हजारदिनोंसे उपरांत नहीं होता है और प्राण, बल, वीर्य इनसे
हीन होजाता है, क्षीण होजाता है, इंद्रिय विकल होजाती हैं ॥ ११६ ॥ जो रोग फिर
नहीं बढ़ाता है वह याप्यरोग छुटजाता है और जो उस रोगके परिश्रमसे युक्त हुआ फिर
खांसीसे युक्त होजाता है ॥ ११७ ॥ उस पुरुषका तीन महीनोंमें अथवा छःमहीनोंमें प्राणोंका
नाश होता है ॥ ११८ ॥
अथ अमृतप्राशनघृत ।
शतमूलीरसे प्रस्थं गुडूचीकल्कप्रस्थकम्॥हरीतकीशतानां च
कुटजस्य त्वचा तुलाम् ॥ ११९ ॥ निष्क्वाथ्य च पृथक्त्वेन
पूतनांश्चैकत्र मिश्रयेत्॥दार्वीप्रलेपनं कृत्वा गुडानां शतपञ्चकम्
॥१२०॥सिता चामलकीचूर्णं त्वगेला चित्रकं शटी ॥ द्राक्षा
कुष्ठं शिलाजित्व शिलाभेदस्तु तालकम् ॥ १२१ ॥ योज्यं
तत्राक्षमानेन भक्षयेच्छुद्धसर्पिषा ॥ तस्योपरि पिबेत्क्षीरं
भोजनञ्च ततः परम् ॥ १२२ ॥ राजयक्ष्मी लभेत्सौख्यं
पाण्डुकामलकाञ्जयेत् ॥ अतीसारं विनश्यति बले नागबलो
भवेत् ॥ १२३ ॥
शतावरीका रस ६४ तोले, गिलोयका कल्क ६४ तोले, बडी सौ १०० हरडोंकी छाल
और कुड़ाकी छाल ४०० तोले ॥ ११९ ॥ इनका जुदा २ काढा बना फिर छानिके एक
जगह मिलावेवे पीछे अग्निपर पकावे जब कडछीके चपकने लगजावे तब ५०० पानसौ गुड़
डाल, ॥ १२० ॥ मिसरी, आंवलाका चूर्ण, दालचीनी, इलायची, चीता, कचूर, दाख, कूट
शिलाजीत, शिलाभेद, शुद्धमारित हरताल॥ १२१॥इनको एक २ तोला प्रमाण गेरै पीछे इसको
अच्छे घृतके संग खावे इसके उपर दूध पीवे पीछे भोजन करे ॥ १२२ ॥ इसके खानेसे राजय-
क्ष्मारोगवाला पुरुष सुखको प्राप्त होताहै और पांडुरोग, कामला, अतिसार इनका नाश होता
है हस्तीके समान बल होजाता है ॥ १२३ ॥