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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २७७ )
नृणां पाण्डुरोगे हलीमके॥८६॥राजयक्ष्मणि क्षये चैव शस्तं
चोक्तं भिषग्वर ॥ ८७ ॥
पञ्चकोल अर्थात् पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, जवाखार; दूध, दही, घृत, भारंगी
कूठ, पोहकरमूल ॥ ८४ ॥ इन सबोंको समान भाग ले और सौ १०० हरडें ले फिर इन
औषधोंसे चौगुने जलमें मन्द मन्द अग्निसे काथ बनावे। मन्द मन्द अग्निसे पकाया हुआ ॥८५॥
यह घृत पानमें, नस्यमें और बस्तिकर्ममें युक्त करना श्रेष्ठ है और पांडुरोग, हलीमक
॥ ८६ ॥ इन रोगोंमें मनुष्योंके अधिक गुण करनेवाला है और हे उत्तम वैद्य ! राजयक्ष्मा
रोगमें यह घृत श्रेष्ठ है ॥ ८७ ॥
अथ पाराशर घृत ।
यष्टी बला गुडूची च पञ्चमूलं समांशकम् ॥ क्वाथेन सदृशं
धात्रीरसं चेक्षुरसं तथा ॥ ८८ ॥ विदार्य्याश्च रसं चैव घृतं च
समभागिकम्॥क्षीरं दधिसमं चात्र नवनीतं तु तत्समम्॥८९॥
द्राक्षातालीशसंयुक्तं यथालाभेन योजयेत्॥सिद्धं घृतं च पानाय
नस्ये वस्तौ प्रदापयेत् ॥९०॥ जयति राजयक्ष्माणं पाण्डुरोगं
सुदारुणम् ॥ हलीमकं चार्शसं च रक्तपित्तनिवारणम् ॥९१॥
लेपेन दुष्टवैसर्पपित्तदग्धव्रणापहम् ॥ ९२ ॥
मुलहटी, खरेहटी, गिलोय, पंचमूल इनको समान भाग ले काथ बनावे और काथके
समान आंवलाका रस और ईखका रस ॥ ८८ ॥ और विदारीकंदका रस मिलावे। इन
औषधोंके समानभाग घृत और दूध, दही, नौनी घृत इन सबोंकों समानभाग ले ॥ ८९ ॥
दाख, तालीसपत्र इनको अनुमानमुवाफिक मिला फिर इस घृतको सिद्ध कर पानमें
नस्यमें और बस्तिकर्ममें देना श्रेष्ठ है ॥ ९० ॥ यह राजयक्ष्मा, पांडुरोग, हलीमक,
बवासीर, रक्तपित्त इनको नाशता है ॥ ९१ ॥ इस घृतका लेप करनेसे दुष्टविसर्परोग,
पित्तरोग, दग्ध, व्रण इनका नाश होता है ॥ ९२ ॥
अथ बलाआदि घृत ।
बला श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयं च पर्णीद्वयं गोक्षुरकं स्थिरा चा॥पटो-
लनिम्बस्य दलानि मुस्तं सत्रायमाणा च दुरालभा च॥९३ ॥
कृत्वा कषायं च यदावशेषं पूतीकृते चूर्णमिदं प्रयुंज्यात्॥द्राक्षा
शटी पुष्करमूलधात्री तमालकी दुग्धसमं कषायम् ॥ ९४ ॥