हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६.] भाषाटीकासमेता । (२४३)
षाणा ॥ १९ ॥ पलालवङ्गालसपद्मकं च योज्या च भृंगी
धनिका समांशा ॥ चूर्णं सखर्जूरसितासमेतं घृतेन तदर्द्धबल-
प्रमाणम् ॥ २०॥ भक्षेतप्रभाते पयसा मनुष्यो निष्क्वाथ्य पानं
सघृतं विधेयम्॥करोति तीव्राग्निसमं प्रकृष्टं कृशस्य पुष्टिं तनुते-
ऽपि नूनम् ॥ २१ ॥ कुमभ्रमशोषविनाशनं स्यात्तृष्णातिलौ-
ल्यप्रशमं करोति ॥ सरक्तपित्तं क्षयपाण्डुरोगं हलीमकं कामल-
माशु नश्येत् ॥ २२ ॥
दाख, हरड़े, कुटकी, बिदारीकंद, चन्दन, वासा, नागरमोथा, परवल, चिरायता,
पीपल, खरेहटी, गोरखमुंडी, अतीस ॥१९ ॥ वालछड़, लौंग, पद्माख, भंगरा, धनियां,
खजूरिया इनको समान भागसे चूर्ण बना उसमें मिश्री मिला पीछे घृतके संग इस
चूर्णको आधी मात्रा प्रमाण ॥ २० ॥ प्रातःकालमें खावे और इसके ऊपर औटाया हुआ
दूधको घृतके संग पीवे. यह तीक्ष्ण अग्निको समान करता है और कृश शरीरको अत्यंत
पुष्ट करता है ॥ २१ ॥ ग्लानि, भ्रम, शोष इनको दूर करता है और अत्यंत
दाहको शांत करता है। रक्तपित्त, क्षयरोग, पांडुरोग, हलीमक, कामला इनको शीघ्र ही
नाशता है ॥ २२ ॥
तण्डुलारक्तशालीनां भागद्वयेन धीमताम् ॥भृष्ट्वा तिलांश्च संकु-
ट्य तदर्द्धेन विमिश्रितान्॥२३॥भृष्ट्वा तत्सममुद्गांश्च चक्रीकृत्य
तु साधयेत्॥सिद्धां च कृशरां सम्यग्घृतेन सह भोजयेत्॥२४॥
एकाहान्तरितो यस्तु तीव्राग्निस्तस्य नश्यति ॥ २५ ॥
लाल चावल २ भाग, भूने हुए तिल १ भाग इनको कूटके फिर इनके बराबर भूने हुए मूंग
मिला ॥ २३ ॥ इनको पकाके खिचड़ी बनावे पीछे इसको घृतके संग भोजन करे ॥
॥ २४ ॥ इसको एकदिन खावे और एक दिन नहीं खावे इस क्रमसे खानेसे तीक्ष्ण अग्नि शांत
होती है ॥ २५ ॥
अथ हरीतक्यादिवटी ।
हरीतकी हरिरतुल्यषड्गुणा चतुर्गुणा चतुर्विशालपिप्पली ॥
हुताशनं संयुतहिङ्गुसैन्धवं रसायनं कुरुनृप वह्निदीपनम्॥२६॥
हरड़े ६ भाग, चार भाग पीपल, चार भाग गजपीपल, चीता, हींग, सेंधानमक इनको एक
जगह पानीमें खरलकर गोली बांध लेवे यह अग्निको दीप्त करनेमें रसायन कहाता है ॥ २६ ॥