हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( २३३)
ऐसे यकृतरोगको दूरसे त्यागे ॥ २० ॥ अब औषधको कहता हूँ-जिसकरके सुख-
की प्राप्ति हो इस रोगकी आदिमें एक लंघन कर पीछे पाचन देना हित है ॥ २१ ॥ सोंठ,
पीपल, लोहाका मैल, कचूर, अजवायन, शतावरी, हरडा इन्होंका क्वाथ अथवा कल्करूपी
पाचन हित है। यह अफारा, गुल्म, विषूचिका (हैजा) इन्होंको नाशता है ॥ २२ ॥ नागरमोथा,
पीपल, हरडै, अदरख ये ले परंतु इनमें तीन भाग हरड़ेके ले और पीपल इनका पाचनइस रोग-
को नाशता है ॥ २३ ॥
अथ यकृद्गुल्मपथ्य ।
क्षतक्षये यकृत्पूर्वे तूपवासं च पाचनम् ॥
न देयं हिङ्गुसंयुक्तं चूर्णं नैव हितं यतः ॥ २४ ॥
क्षतक्षय रोगसे संयुक्त हुए यकृत् रोगमें लंघन और पाचन हित नहीं है और इस रोगवा-
लेको हींगसे संयुक्त किया चूरन नहीं देना, क्योंकि वह हित नहीं है॥ २४ ॥
अथ निम्बादि क्वाथ ।
निम्बनीपधरवेतसं निशा काश्मरी च तुलसी च सिंहिका ॥
क्वाथ एष हृदयामयापहः शूलमाशु यकृतश्च नाशकृत्॥२५॥
नींबकी छाल, कदम्बकी छाल, बिनोलाकी गिरी, मन नामक वनकी ओषधि विशेष,
हलदी, कंभारी, तुलसी, कटेहली इनका क्वाथ हृदयरोग, कफ, शूल, मुखका रोग और यकृत्-
को नाशता है ॥ २५ ॥
अथ सौराष्ट्रिकादि क्वाथ ।
सौराष्ट्रिकासीसमहौषधानि दुरालभाजातिप्रवालकं च ॥
दार्बी यवानी ककुभं समङ्गा क्वाथः ससर्पिर्यकृदाशु हन्ति॥२६॥
फिटकरी, कसीस , सोंठ, जवासा, चमेलीकी कोंपल, दारुहलदी, अजवायन, अर्जुनवृक्षकी
छाल, मंजीठ इनका क्वाथ घृत मिलाकर पीनेसे यकृतरोगका नाश होता है ॥ २६ ॥
अथ धवादि क्वाथ ।
धवार्जनकदम्बानां शिरीषबदरीषु च ॥
निष्क्वाथ्य पानमामघ्नं विषूच्या शूलवारणम् ॥ २७ ॥
धवके फूल, अर्जुन और कंदबवृक्षकी छाल, मौलशिरी और बेरकी छाल, इनका क्वाथ बना
पीवे । यह आमदोष, विषूचिका (हैजा) शूल इनको दूर करता है ॥ २७ ॥
अथ कदलीजलपानक ।
कदलीक्षारमादाय शंखक्षारमथापि वा ॥ प्रस्त्राव्य जलपानं तु