हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३] भाषाटीकासमेता । ( २२३ )
त्रिदोषसन्निपातोत्थश्चातिसारश्च दारुणः॥ शूलमूर्च्छाभ्रमाना-
हकामलानां विपाचनः॥६९॥ क्षतक्षीणक्षयाणां तु हितोऽयम-
मृतो वटः ॥ ७० ॥
हरड़े, शालवन, पिठवन, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, गोखरू इनको पानीमें उबाल
चौथा हिस्सा शेष रहे ऐसा क्वाथ बनावे ॥ ६५ ॥ पीछे अदरख, लाख, पीपल, कुटकी,
अनारदाना, अनारकी छाल, दारुहलदी, कूडाकी छाल, अतीश ॥ ६६ ॥ वांसा, इन सबोंका
चूर्ण बना पूर्वोक्तमें मिलावे और क्वाथसे आधा हिस्सा बकरीका दूध और आठवां हिस्सा
घृतको मिला पकावे ॥ ६७ ॥ जब कड़छीपै चिपकने लगे तब जान १६ तोले गुड़ मिलाय
सायंकालके भोजनमें देवे ॥ ६८ ॥ इससे सन्निपातका दारुण अतिसार, शूल, मूर्च्छा, भ्रम
अफारा, कामला, ये शांत होते हैं ॥ ६९ ॥ क्षतक्षीण और क्षयरोगी इनको यह अमृतवटक
हित है ॥ ७० ॥
अथ बिल्वादिचूर्ण ।
एकबिल्वागुरुरोध्रचूर्णं मध्वादियोजितम् ॥
रक्तातिसारशमनं बालानां क्षीणधातुकम् ॥ ७१ ॥
एक १ बेलगिरी, अगर, लोध, इनके चूर्णमें शहद मिला बालकको चटावे यह धातुओंको
क्षीण करनेवाले रक्तातिसारको नाशता है ॥ ७१ ॥
अथ गुदाके निकसनेकों ( काँच ) बन्द करनेकी चिकित्सा ।
यदा गुह्यं निरस्येत्तु तदा कुर्य्यात्क्रियामिमाम् ॥ सहचर्य्या-
बलानां च रसो ग्राह्यो घृतं पुनः॥७२॥ पक्वघृतेन लेपः स्या-
त्तस्य चेदं प्रशस्यते ॥ अरणीपल्लवक्वाथो वाप्यं लोष्टं सचन्द-
नम् ॥७३॥ प्रतप्तमथवाग्निनिभं तथा नरस्य निर्वाप्य काञ्जि-
कमथ विदधीत तद्वत् ॥ सौख्यं च सम्यग्गुदसेचनकं प्रशस्त
संवेश्य मध्यतो गुदं दृढबन्धनं स्यात् ॥ ७४ ॥
जब गुदाकी कांच निकसे तब यह क्रिया करनी, पीला कुरंटा और खरैहटीके रसमें घृतको
पका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ७२ ॥ अरनीके पत्तोंके क्वाथमें चुल्हाकी माटी और चन्दनको गर-
मकर बुझावे अथवा इसीरीतिसे कांजीको बनावे इनसे अच्छीतरह गुदाको सेचे ॥७३॥ और
कांचको गुदाके बीचमें प्रवेश कर दृढबन्धन करना ॥ ७४ ॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu