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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

( २२० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
दहीसे युक्तहुये भोजनके सेवनसे कफातीसार उपजता है और जो आप नहीं पक्ता है पेटकी
अग्निको नाशता है ॥ ४८ ॥ जिसका मल चिकना और सफेद गाढ़ा दुर्गंधिलिये शीतल,थोड़ी
पीड़ासहित उतरे और शरीर भारी रहे और भोजनमें अरुचि हो उसको कफातिसार कहते
हैं ॥ ४९ ॥
अथ कफातिसारकी चिकित्सा ।
तस्यादौ लंघनं प्रोक्तं ज्ञात्वा देहबलाबलम् ॥
पाचनं च विधातव्यं त्र्यूषणाद्यं भिषग्वर ॥ ५० ॥
तिसकी आदिमें देहके बल और अबलको जानके वक्ष्यमाण पाचनको देवे ॥ ५० ॥
अथ त्र्यूषणादिक पाचन ।
त्र्यूषणमभया हिङ्गु चातिविषा रुचकं वचायुक्तम् ॥
मधुसहितं लेहनं नृणां गङ्गामपि वाहिनीं रुन्ध्यात् ॥ ५१ ॥
सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़ै, हींग, अतीस, कालानमक, वच इन्होंके चूर्णमें शहद मिला
चाटे यह मनुष्योंके गंगाके समान बहतेहुये अतीसारको रोकता है ॥ ५१ ॥
अथ कालिङ्गादि कल्क ।
कालिङ्गपाठातिविषा बला च सोदीच्यमुस्तामरिचानि शुण्ठी ॥
गुडेन क्षौद्रेण प्रशस्तकल्को रक्तातिसारे कफजे शमाय ॥ ५२॥
इन्द्रयव, श्योनापाठा, अतीस, खरैंहटी, नेत्रवाला, नागरमोथा, मिर्च, सोंठ इन्होंके
कल्कमें गुड़ और शहद मिला खावे,यह रक्तातिसारमें और कफातिसारमें हित है ॥ ५२ ॥
अथ वत्सकादि क्वाथ ।
वत्सकातिविषबिल्वमुस्तकं वालकेन सहितं जले न तु ॥
क्वाथपानमतिशूलरक्तपूयनाशं ज्वरयुतेऽतिसारके ॥ ५३ ॥
कूड़ा, अतीस, बेलगिरी, नागरमोथा, नेत्रवाला, इन्होंका पानीमें क्वाथ बना पीवे यह
अत्यंतशूल, रद, ज्वर, कफ, इनसे युक्त हुए अतिसारमें हित है ॥ ५३ ॥
अथ रक्तातिसारका लक्षण ।
यस्तु रक्तं च शुद्धं विरेचने शोषदाहमतिरिञ्चेत् ॥
रक्तातिसार इति ज्ञेयो वैद्यैर्महामतिभिः ॥ ५४ ॥
जो रोगी मल उतरनेके समय शुद्ध रक्त शोष और दाहसे युक्त छोड़े वह रक्तातिसारी है
ऐसे समझदार वैद्योंको जानना चाहिये ॥ ५४ ॥