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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 548 में से

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पृष्ठ 243

॰अ० २ ] भाषाटीकासमेता । (२११)
लानि प्रयोजयेत् ॥२३९॥ कोशातकी पटोलं च शुण्ठीकं च
हितं भवेत् ॥
जैसे विषवेगको करके आशयमें लीन होके फिर समयपर अत्यंत कुपित होता है तैसे ही
दोष भी समयपर फिर कुपित होता है ॥ २३६ ॥ शालिचावल, सांठीचावल, मूंग और
अरहरका यूष और पूर्वोक्त शाक ये सब वातको नाशते हैं ॥२३७॥ सौंफ, जीवंती, चौलाई,
बथुवा, इन्होंकी भाजीको घृतमें सिद्धकर प्रयुक्त करे ॥ २३८ ॥ लावा, तीतर, बत्तक, मृग,
छिक्कर इन आदि जांगलदेशके जीवोंके मांसोंको भी रोगीको देवे ॥ २३९ ॥ तोरी, परवल,
सूंठ ये भी हित हैं ॥
अथ ज्वरवालेकूं अपथ्य ।
वर्जयेद्विदलान्नानि विदाहीनि गुरूणि च ॥ २४०॥ न पिच्छ-
लानि तैलानि तथाम्लानि च वर्जयेत् ॥ दधिमस्तुविशालानि
क्षुद्रान्नानि भिषग्वरः ॥ २४१ ॥ बहूदकञ्च ताम्बूलं घृतं वापि
सुरामपि ॥ २४२ ॥ क्रोधं शोकञ्च त्यक्त्वा वै सदा सौख्यं
विभुञ्जते ॥ न कुर्याज्जागरं रात्रौ दिवास्वप्नञ्च वर्जयेत्॥२४३॥
शकटवाजिकरिद्विपिवाहनं प्रबलं परिवर्जयेत्तु सततम्॥ ज्वरि-
णमाशु सुखं बुभुजे सुधीः शुभविधाननिधान उपस्थितः २४४॥
विदलसंज्ञक और दाहको करनेवाले और भारी ऐसे अन्नोंको त्यागे ॥ २४० ॥ कफकारी
तेल सेवने हुए और खट्टे ऐसे शाकोंको भी वर्जे, दही,दहीका पानी, रसाला, क्षुद्रअन्न ॥२४१॥
बहुत पानी, नागरपान, घृत, मदिरा ॥ २४२ ॥ क्रोध, शोक इन्होंको त्यागके रोगी सबका-
लमें सुखको प्राप्त होता है, रात्रिमें जागे नहीं और दिनमें सोवे नहीं ॥ २४३ ॥ गाडी, घोड़ा,
हस्ती, गेंडा इन्होंकी सवारीको रोगी निरंतर त्यागे एसे त्यागनेसे ज्वरवालेको सुख
उपजता है ॥२४४ ॥
अथ ज्वरमुक्तोंका वर्तना ।
व्यायामं च व्यवायं च अशनं रात्रिजागरम् ॥ ज्वरमुक्तो न
सेवेत तदा सम्पद्यते सुखम् ॥२४५॥इति आत्रेयभाषिते हारी-
तोत्तरे तृतीयस्थाने ज्वरचिकित्सानाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥
ज्वरसे मुक्त हुआ मनुष्य कसरत, स्त्रीसंग, अति भोजन, रात्रिको जागना इन्होंको नहीं सेवे,