हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] भाषाटीकासमेता । (१९९)
पीस कर्णमूलपर लेप करना । यह लेप रक्तके विकारको नाशता है, शोजा और वावको शान्त
करता है ॥ १६८ ॥
अथ व्रणरोपण औषध ।
यदा पाको भवेत्तस्य कार्या तत्र प्रतिक्रिया॥ धवार्जुनकदम्ब-
त्वग्लेपनं व्रणरोहणम्॥ १६९॥ निम्बारग्वधमूलानां निशायुक्तं
प्रलेपनम्॥स्रावणं पूयगन्धानां रोहणं स्याद्व्रणेषु च ॥ १६०॥
जो कानकी जड़में शोजा पक जावे वहां जो क्रिया करनी चाहिये वहकही जाती है, धवकी
छाल, अर्जुनवृक्षकी छाल, कदंबकी छाल इनको पीस लेप करनेसे घावपै अंकुर आ जाता है
॥ १६९ ॥ नींवकी छाल, अमलतासकी छाल, हल्दी इनका लेप राध और दुर्गंधको हटाता
है और घावोंपर अंकुरको लाता है ॥ १६० ॥
अथ कर्णशोथवालेको पथ्य ।
वर्जयेच्च दिवास्वप्नं योषित्सङ्गं बहुदकम्॥ शीतांबु जागृतिं रात्रौ
व्यायामं शोचनं तथा॥ १६१॥ माषांश्च यवगोधूमतिलपर्णीकमेव
च ॥ मसूरत्रिपुटांश्चैतांस्तैलञ्च दूरतस्त्यजेत् ॥ १६२॥ मास-
मेकं व्यवायं च पक्षैकं चातिभोजनम्॥ वर्जयेत्कर्णमूलञ्च सुखं
तेनोपपद्यते ॥ १६३॥ षष्टिकात्रं पुराणं वा बाल्यं सूपस्तथा-
ढकी ॥ कुलत्थमुद्गयूषं वा भोजने च प्रशस्यते ॥ १६४ ॥
वार्त्ताकञ्च पलाण्डु च कन्दशाकान्परित्यजेत् ॥ एतेन सुखमा-
प्नोति शीघ्रं रोगाद्विमुच्यते ॥ १६५ ॥
इस कर्णमूलमें दिनका सोना, स्त्रीसंग, पानीका बहुत पीना, शीतल पानी, रात्रिका जागना,
कसरत, सोच ॥ १६१ ॥ उड़द, यव, गेहूं, तिलका पदार्थ, मसूर, त्रिपुँटा, तेल इनको दूरसे
बर्जे ॥ १६२ ॥ और एक महीनातक मैथुनको और पंद्रह दिनोंतक अत्यन्त भोजनको वर्जेतब
सुख होता है ॥ १६३ ॥ साठीचावल, पुरानाअन्न, अरहरकी दाल, कुलथी और मूंगौंकायूष ये
सब भोजनमें श्रेष्ठ हैं ॥ १६४ ॥ वार्त्ताकु (बैंगन), प्याज, कंदशाक इनको त्यागे ऐसे कर-
नेसे सुखको प्राप्त होता है और शीघ्र रोगसे छूटता है ॥ १६५ ॥
१ मल्लिका, सूक्ष्मैला, त्रिवृत, कर्णस्फोटा, स्थूलैला, कलायू, चमेली, छोटी इलायची, निशोथ, तिरबी
कनफोडी, बडी इलायची, खेसारी, मटर । आयुर्वेदशब्दार्णव ।