हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९६ ) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने-
शिरसके बीज, मिर्च, पीपल, सेंधानमक इनको गोमूत्रमें पीस नेत्रोंमें आंजे । यह अंजन
नष्टहुई संज्ञाको फिर उपजाता है ॥ १३५ ॥ सोंठ, मिर्च, पीपल, करंजुवाके बीज, हरडैं,
बहेड़ा, आँवला, देवदार, सेंधानमक, तुलसी, इनको पीस बत्ती बना नेत्रोंमें आंजे । यह
आंजन तंद्राको नाशता है ॥ १३६ ॥
अथ निष्ठीवनविधि ।
केसरं मातुलुङ्गस्य शृङ्गवेरं ससैन्धवम् ॥ त्रिकटुसंयुक्तं कृत्वा
आकण्ठाद्धारयेन्मुखे ॥ १३७ ॥ दन्तजिह्वामुखं तालुघर्षणं
कारयेद्बुधः॥ कुर्य्यान्निष्ठीवनं सर्वं वारंवारं विधानतः॥१३८॥
तेन कण्ठविशुद्धिः स्याच्छ्लेष्माणं चापकर्षति॥जिह्वापटुत्वरु-
चिक्कृत्कासः श्वासश्च शाम्यति ॥१३९॥ त्रिकटुचव्यकापथ्या-
चूर्णं सैन्धवसंयुक्तम् । तेन दन्तांस्तथा जिह्वां घर्षयेत्तालुकाम-
लम् ॥ १४० ॥ निष्ठीवनं गलशुद्धिरुचिकृत्कफसूदनम् ॥
हल्ल्लासो नाशमाप्नोति पटुत्वं कुरुते भृशम् ॥ १४१ ॥
बिजौराकी केसर, अदरख, सेंधानमक, सोंठ, मिरच, पीपल इनको मिला मुखमें धारे
॥ १३७ ॥ पीछे दंत, जीभ, मुख, तालु इन्होंको घिसे पीछे विधानसे बारंबार थूकता जावे
॥ १३८ ॥ इससे कंठकी शुद्धि होती है और कफ दूर होजाता है और जीभ साफ होजाती
है और रुचि उपजती है, खांसी और श्वास शांत होजाता है ॥ १३९ ॥ सोंठ, मिरच,
पीपल, चव्य, हरडै, सेंधानमक इन्होंके चूर्णसे दंत, जीभ, तालु, इन्होंको घिसे ॥ १४० ॥
यह निष्ठीवनकर्म गलकी शुद्धि और रुचिको करता है, कफको दूर करता है, थुकथुकीको
नाशता है और अत्यन्त स्वादको उपजाता है ॥ १४१ ॥
अथ सन्निपातमें विशेषता ।
यदि वा शीतगात्रे च तदा स्वेदो विधीयते ॥ स्वेदास्त्रयोदश
ज्ञेयाः स्वेदवारणकारणाः ॥ १४२ ॥ सङ्करःप्रस्तुतो नाडीप-
रिषेकोऽपगाहनः ॥ आतङ्कोऽस्मयनः कर्षः कूटी भूकुम्भिरेव
च ॥१४३॥कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ॥१४४॥
कालस्वेदं घटीस्वेदं वालुकास्वेदमेव च॥ कारयेद्धस्तपादाभ्यां
१ स्विद्यतेऽनेनेति स्वेदोऽग्निस्तस्य वारणे कारणाः ।