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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 548 में से

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पृष्ठ 208

( १७६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
कितनेक रोग कर्मसे उपजते हैं और कितनेक रोग दोषसे उपजते हैं और कितनेक रोग
शरीरके साथ उपजते हैं ऐसे तीन प्रकारके रोग कहे हैं ॥ २३ ॥
तीन प्रकारके व्याधियोंका लक्षण ।
बहुभिरुपचारैस्तु ये न यान्ति शमं ततः॥ते कर्मजाः समुद्दिष्टा
व्याधयो दारुणाः पुनः ॥२४॥दोषजा वातपित्ताद्याः सहजाः
क्षुत्तृषादयः ॥ २५ ॥
जो बहुतसी चिकित्साके करनेसे शांतिको प्राप्त नहीं होते उनको कर्मसे उपजे रोग जानना,
ये दारुण हैं ॥ २४ ॥ वातपित्तादिसे उपजे रोग दोषज कहाते हैं, भूख और तृषाआदिके
साथ उपजनेवाले सहज कहलाते हैं ॥ २५ ॥
ज्वरकी व्यापकता ।
तस्माद्वक्ष्यामि चादौ ज्वरमतुलगदं वाजिनां कुञ्जराणां मानुष्या-
णां पशूनांमृगमहिषखरोष्ट्रादिवानस्पतीनाम् ॥ वल्लीनामोषधी-
नां क्षितिधरफणिनां पत्रिणां मूषिकाणामेषः प्राणापहारी ज्वर
इति गदितो दुर्निवारो हि लोके ॥ २६ ॥
इस लिये आदिमें घोड़ा, हस्ती, मनुष्य, गाय आदि,पशु मृग, भैंसा,ऊंट आदि, जीव, वन-
स्पति, वेल, ओषधी, सर्प,पक्षी, मूषा इनके ज्वरको मैं कहता हूँ, यह ज्वर प्राणोंको हरता है
और संसारमें दुःखसे दूर होता है ॥ २६ ॥
अथ जातिपरत्वमें ज्वरकी असाध्यता ।
असाध्योऽयं ज्वरो व्याधिर्गोमहिष्यश्वकुञ्जरे ॥
किञ्चित्कृच्छ्रतमो नृणामन्येषां जीवघातकः ॥ २७ ॥
गाय, भैंसा, हस्ती, इनमें ज्वर असाध्य कहा है और मनुष्योंका ज्वर कुछ कष्टसाध्य कहा है
और शेष रहे जीवोंको ज्वर मारता है ॥ २७ ॥
अथ ज्वरकी बलिष्ठता ।
यथा मृगाणां मृगयुर्बलिष्ठस्तथा गदानां प्रबलो ज्वरोऽयम् ॥
नान्योऽपिशक्तो मनुजं विहाय सोढुं भुवि प्राणभृतं सुराद्यम्॥२८॥
जैसे मृगोंमें सिंह बलवान् है वैसे ही रोगोंमें यह ज्वर प्रवल है । कोई भी अन्यजीव संसारमें
प्राणको धारण करनेवाले पृथिवीमें देव मनुष्यके बिना ज्वरको सह नहीं सकता है ॥ २८ ॥