हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६] भाषाटीकासमेता । ( १४९ )
पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रमें जिसको ज्वर उत्पन्न होवे ॥ ३२ ॥ उस मनुष्यका ज्वर प्रथम अंशमें
पांच रात्रितक रहता है, दूसरे अंशमें बारह दिनतक रहता है और तीसरे अंशमें ज्वर उत्पन्न
होवे, उस मनुष्यका एक महीनेके पीछे मृत्यु होगा ऐसा जानना ॥ ३३ ॥
अथ उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र ।
उत्तराया आद्यभागे वासराणि चतुर्दश ॥
द्वितीये सप्तरात्रन्तु तृतीये दिवसा नव ॥ ३४ ॥
उत्तराके प्रथमभागमें रोग उपजे तो चौदह दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें सात
रात्रि और तीसरे भागमें नव दिन पीड़ा रहती है ॥ ३४ ॥
अथ हस्त नक्षत्र ।
यदि हस्ते भवेद्रोगः प्रथमे सप्तरात्रकम् ॥
चत्वार्यहानि द्वितीये तृतीये दिनपञ्चकम् ॥ ३५ ॥
हस्तके प्रथमभागमें रोग उपजे तो सात रात्री पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें चार दिन
और तीसरे भागमें पांच दिन पीड़ा रहती है ॥ ३५ ॥
अथ चित्रा नक्षत्र ।
मृत्युं विद्यात्तथा पूर्वे त्वाष्ट्रो यस्य भवेज्ज्वरः॥ त्रिभिर्मासैर्द्विती-
यांशे रोगो भवति दारुणः ॥ ३६ ॥ तृतीयांशे तथा ज्ञेयं
वासराणि त्रयोदश ॥
चित्राके प्रथम भागमें जिसके ज्वर उपजे उसका मृत्यु होजाता है और दूसरे भागमें रोग
दारुणरूपी होके तीन महीनोंमें दूर होता है ॥ ३६ ॥ और तीसरे भागमें तेरह दिन पीड़ा
रहती है ॥
अथ स्वाती नक्षत्र ।
वायव्ये प्राक् सप्तदश द्वितीये चैकविंशतिः॥ ३७ ॥अस्यैव तु
तृतीयांशे मृत्युमेव विनिर्दिशेत् ॥ ३८ ॥
स्वातीके प्रथम भागमें रोग उपजे तो सत्रह दिन पीड़ा रहती है और दूसरे भागमें
रोग उपजे तो इक्कीस दिन पीड़ा रहती है ॥ ३७ ॥ और तीसरे भागमें रोग उपजे तो मृत्युही
जानना ॥ ३८ ॥
अथ विशाखा नक्षत्र ।
प्रथमांशे विशाखायां त्रिगुणाः षोडश स्मृताः ॥
द्वितीये द्वादश प्रोक्तास्तृतीयेऽपि तथैव च ॥३९॥
Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu