हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] भाषाटीकासमेता । ( १४१ )
अथ मूढगर्भका अरिष्ट ।
गर्भकोशसमापन्नो मकुष्ठो योनिसंगतः ॥
हन्ति स्त्रियं मूढगर्भे यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ॥ ४१ ॥
गर्भकोशमें समापन्न हुआ बालक योनिके छिद्रको बंधकरे और यथोक्त सब उपद्रव भी उपजे
तब मूढगर्भ स्त्रीको मार देता है ॥ ४१ ॥
अथ अपस्माररोगका अरिष्ट ।
पार्श्वभंगान्नविद्वेषशोफातीसारपीडितम् ॥ बहुशोऽपस्मरं तं तु
क्षीणं च वलितध्रुवम् ॥४२॥ नेत्राभ्यां च विकुर्वाणमपस्मारो
विनाशयेत् ॥ ४३ ॥
पसलीका भंग, अन्नसे वैर, शोजा, अतीसार इनसे पीड़ित हुआ और बहुतवार विस्मरणको
प्राप्त हुआ और क्षीण और टेढ़ी भ्रुकुटियोंवाला ॥ ४२॥ और नेत्रोंको फाड़कर देखनेवाले मनु-
ष्योंको मृगीरोग मार देता है ॥ ४३ ॥
अथ वातव्याधिका अरिष्ट ।
शूलं सुप्तत्वचं भग्नमाध्मानेन निपीडितम् ॥
रुजार्त्तिमन्तं च नरं वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥ ४४ ॥
शूल और सोती हुई खालसे संयुक्त हो और भग्न हो और अफारासे निरंतर पीड़ित हो और
पीड़ासे संयुक्त हो ऐसे मनुष्यको वातव्याधि नाशती है ॥ ४४ ॥
अथ प्रमेहका अरिष्ट ।
यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रस्रुतमेव च ॥
पिडकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥ ४५ ॥
यथोक्त उपद्रवोंसे व्याप्त हो और अत्यंत गिरता हो और फुन्सियोंसे अत्यंत पीडित हो ऐसे
मनुष्यको प्रमेहरोग नाशता है ॥ ४५ ॥
अथ कुष्ठरोगका अरिष्ट ।
प्रभिन्नं प्रस्रुतांगं च रक्तनेत्रं हतस्वरम् ॥
पञ्चकर्मगुणातीतं कुष्ठं हन्तीह कुष्ठिनम् ॥ ४६ ॥
प्रभिन्न हुआ और बहते अंगोंवाला और लाल नेत्रोंवाला और नष्ट हुए स्वरवाला और वमन,
विरेचन, नस्य, निरूहबस्ति, अनुवासनबस्ति इन पंचकर्मोंके गुणोंसे वर्जित ऐसे कुष्ठीको कुष्ठ-
रोग मार देता है ॥ ४६ ॥