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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 548 में से

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पृष्ठ 126

( ९४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-
अथ रतालूका गुण ।
ताम्बूलपर्णः कन्दः स्याच्छुक्रलो विशदो लघुः ॥ ३३ ॥
रतालूकंद वीर्यको बढ़ाता है, सुंदर है और हलका है ॥ ३३ ॥
अथ हस्तिकंदका गुण ।
हस्तिकन्दो गुरुर्ग्राही शुक्रवृद्धिप्रदो मतः ॥
हस्तिकंद भारी है, कब्जको करता है, वीर्यको बढ़ाता है ॥
अथ वाराहकंदका गुण ।
वराहकन्दश्चार्शोघ्नो वातगुल्मनिवारणः ॥ ३४ ॥
वराहकंद बवासीरको नाशता है, वातको और गुल्मको दूर करता है ॥ ३४ ॥
अन्ये तेऽज्ञातकन्दाश्च ते न प्रोक्ता मयाऽनघ ॥ सर्वेषां कन्द-
शाकानां सूरणः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ३५ ॥ दीपनोऽर्शस्तथा गुल्म-
क्रिमीप्लीहविनाशनः ॥ दद्रूणां रक्तपित्तानां कुष्ठानां न प्रशस्यते
॥ ३६ ॥ एते कन्दाः समाख्याताः श्रीमन्तो हि भिषग्वर ॥ ३७ ॥
इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने शाकवर्गोनाम षोड-
शोऽध्यायः ॥ १६ ॥
अन्य भी कंद हैं वे अप्रसिद्ध हैं इस वास्ते मैंने नहीं कहे हैं परंतु सब प्रकारके कंद शाकों-
में जमीकंद श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥ और अग्निको जगाता है बवासीर, गुल्म, कृमिरोग,
तिल्लीरोग इन्होंको नाशता है परंतु दद्रू रक्तपित्त और कुष्ठको अच्छा नहीं है ॥ ३६ ॥
हे वैद्यवर ! शोभासे युक्त हुए कंद मैंने अच्छी तरह कहे हैं ॥ ३७ ॥ इति बेरीनिवासिबुध-
शिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने शाकवर्गो नाम
षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
सप्तदशोऽध्यायः १७.
अथ फलवर्ग ।
आम्रं जम्बूश्च कोलश्च दाडिमामलकं तथा ॥ खर्जूरश्च परूषश्च
मातुलुंगपियालजम् ॥ १ ॥ नारंगं वाल्मिका चैव द्राक्षा च करम-
र्दकम् ॥ क्षीरिका मधुराश्चैव फलवर्गे प्रकीर्तिताः ॥ २ ॥