हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १०] भाषाटीकासमेता । (७५)
अथ साधारण खांड़का गुण ।
वातपित्तहरं शीतं स्निग्धं बल्यं सुखप्रियम् ॥
चक्षुष्यं श्लेष्मकृच्चोक्तं खण्डं वृष्यतमं मतम् ॥ १३ ॥
खांड साधारण वातको और पित्तको हरती है, शीतल है, चिकनी है, बलमें हित है, मुखमें-
प्रिय है, नेत्रोंमें हित है, कफको करती है और वीर्यको अति बढ़ाती है ॥ १३ ॥
अथ मिश्रीका गुण ।
सिता सुमधुरा प्रोक्ता वृष्या शुक्रविवर्द्धनी ॥
पित्तघ्नी मधुरा बल्या शर्करा पालिनी नृणाम् ॥ १४ ॥
मिश्री सुंदर मधुर है, धातुओंको पुष्ट करती है, वीर्यको बढ़ाती है पित्तको नाशती है, मधुर
है, बलमें हित है, मनुष्योंकी रक्षा करती है ॥ १४ ॥
अथ सुन्दरखांडका गुण ।
शर्करान्या सुशीता च कासशूलसमुद्भवा ॥
हिता पित्तासृजि शोषे मूर्च्छाभ्रममदापहा ॥ १५ ॥
सफेद खांड सुंदर शीतल है, खांसीको और शूलको उपजाती है, पित्त रक्तमें हित है,
शोषमें हित है और मूर्च्छा, मद, भ्रम, इनको नाशती है ॥ १५ ॥
अथ गुडकी विशेषता ।
गुदामये कामलशोषमेहे गुल्मामय पाण्डुहलीमके च ॥ वाते
सपित्तासृजि राजरोगे रुचिप्रदो रोगहरो गुरुः स्यात् ॥१६ ॥
कासे शोषे गुडो नेष्ट अन्यत्रापि हितो मतः ॥ योगयुक्तोहि सर्वत्र
हितो गुणगणालयः ॥१७॥ क्षामक्षामक्षतगतरुजाश्वासमूर्च्छा-
गदीनामध्वश्रान्तिश्रममदविषमूत्रकृच्छ्राश्मरीणाम्॥जीर्णक्षाम-
ज्वरविषमगे रक्तपित्तप्रकोपे तृष्णादाहक्षयरुधिरगे सर्वरोगा-
न्निहन्ति ॥ १८॥ इति आत्रेयभाषितं हारीतोत्तरे प्रथमस्थाने
इक्षुवर्गो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
गुदारोगमें, कामलामें, शोषमें, प्रमेहमें गुल्ममें, पांडु और हलीमकमें, वातमें, रक्तपित्तमें,
राजरोगमें, गुड़ रुचिको देता है और रोगको हरता है, भारी है ॥ १६ ॥ परंतु खांसी
और शोषमें अकेला गुड़ अच्छा नहीं है और अन्य जगह हित है और योगोंमें युक्त किया गुड़
सब रोगोंमें हित है और गुणोंके समूहका स्थान है ॥ १७ ॥ कृश, क्षयरोग, श्वास, मूर्च्छा,