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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 258 में से

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पृष्ठ 15

भूमिका
यह ऐतिहासिक काव्य कवि जोधराज का बनाया हुआ है।
नीमराणा के राजा चंद्रभान की आज्ञा से जोधराज ने इस काव्य को
संवत् १७८५ में रचा। इसमें रणथंभौर के वीरशिरोमणि महाराज
हम्मीरदेव का चरित्र और विशेष कर अलाउद्दीन के साथ उनके
विग्रह का वर्णन है। भारतवर्ष के इतिहास में हम्मीर का नाम प्रसिद्ध
है और उसके चरित्र को पढ़ और सुनकर लोग अब तक मनोमुग्ध
और उत्साहित होते हैं। कवियों और लेखकों ने भी उसके चरित्र
का गान करने में कोई बात उठा नहीं रखी है। अब तक कविता
में इस विषय के तीन ग्रंथ प्राप्त हुए हैं। एक तो चंद्रशेखर का हम्मीर-
हठ है जो छपकर प्रकाशित हो चुका है। दूसरा ग्वाल कवि का
ग्रंथ है जो अब तक छुपा नहीं। उसकी कविता-शैली भी ऐसी
उत्तम नहीं है। तीसरा ग्रंथ यह जोधराज का है। और भी अनेक
ग्रंथ इस विषय के होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। गद्य में भी अनेक
ग्रंथ लिखे गए हैं परंतु दुःख के साथ कहना पड़ता है कि उनमें
ऐतिहासिक खोज का बहुत कुछ अभाव देख पड़ता है। राजपूताने
में दो हम्मीर हो गए हैं। एक उदयपुर के और दूसरे रणथंभौर के।
लेखकों ने प्रायः दोनों के चरित्रों को मिलाकर एक कर डाला है और
इसी भ्रम में पड़कर इतिहास के विरुद्ध बातें लिख डाली हैं। जिन
हम्मीर की इतनी प्रसिद्धि है और जिनके गुण गाने से अब तक लोग
उत्साहित होते हैं तथा जिन्होंने अलाउद्दीन से रार ठानी थी वे रण-
थंभौर के चौहान थे; न कि उदयपुर के सिसौदिया हम्मीर। अतएव
इस काव्य के विषय में कुछ लिखने के पहले अथवा इसके संबंध की
ऐतिहासिक बातों का उल्लेख करने के पहले मैं जोधराज कृत इस
काव्य में चौहान हम्मीर का जो कुछ चरित्र वर्णन किया गया है उसे